ताँहारे आपन - सेवा कराइते ना युयाय ।
गुरु आज्ञा दियाछेन, कि करि उपाय ॥143॥
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अनुवाद
"इस प्रकार, यह उचित नहीं है कि गुरु का सेवक मेरी व्यक्तिगत सेवा में लगे। फिर भी मेरे गुरु ने यह आदेश दिया है। मैं क्या करूँ?"
"So it would not be appropriate for the Guru's servant to serve me personally. Yet my Guru has given this order. So what should I do?"
तात्पर्य
गुरु के सेवक या शिष्य एक-दूसरे के ईश्वरीय भाई होते हैं और उन्हें एक-दूसरे का प्रभु या स्वामी की तरह सम्मान करना चाहिए। किसी को भी अपने ईश्वरीय भाई का अनादर नहीं करना चाहिए। इसी कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने सर्वभौम भट्टाचार्य से पूछा था कि गोविंद के बारे में क्या करना चाहिए। गोविंद ईश्वर पुरी, श्री चैतन्य महाप्रभु के आध्यात्मिक गुरु के व्यक्तिगत सेवक थे और अब ईश्वर पुरी ने गोविंद को श्री चैतन्य महाप्रभु का व्यक्तिगत सेवक बनने का आदेश दिया था। तो फिर क्या किया जाना चाहिए? यह वही प्रश्न था जो श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक अनुभवी मित्र, सर्वभौम भट्टाचार्य के सामने रखा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥