| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना » श्लोक 135 |
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| | | | श्लोक 2.10.135  | गोसाञि कहिल, ‘पुरीश्वर’ वात्सल्य करे मोरे ।
कृपा करि’ मोर ठाञि पाठाइला तोमारे ॥135॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, "मेरे गुरु ईश्वर पुरी सदैव मुझ पर पितृवत स्नेह रखते हैं। अतः अपनी अहैतुकी कृपा से उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजा है।" | | | | Sri Chaitanya Mahaprabhu replied, "My guru, Ishvara Puri, always loved me like a father. That is why, out of his causeless mercy, he has sent you here." | | ✨ ai-generated | | |
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