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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  2.10.116 
सङ्गीते - गन्धर्व - सम, शास्त्रे बृहस्पति ।
दामोदर - सम आर नाहिं महा - मति ॥116॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर गंधर्वों के समान ही कुशल संगीतज्ञ थे, और शास्त्रार्थ में वे देवों के पुरोहित बृहस्पति के समान थे। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि स्वरूप दामोदर जैसा कोई महान व्यक्तित्व नहीं था।
 
Swarup Damodara was a skilled singer comparable to the Gandharvas, and in discussions of scriptures, he was comparable to Brihaspati, the priest of the gods. Therefore, it follows that there was no other great man like Swarup Damodara.
तात्पर्य
स्वरूप दामोदर गोस्वामी संगीत के साथ-साथ वैदिक शास्त्रों में भी बहुत निपुण थे। श्री चैतन्य महाप्रभु उनके विशेषज्ञ गायन और संगीत कौशल के कारण उन्हें दामोदर कहते थे। दामोदर नाम श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिया गया था और उनके सन्यास-गुरु द्वारा दिए गए नाम में जोड़ा गया था। इसलिए वह स्वरूप दामोदर, या दामोदर स्वरूप के रूप में जाने गए। उन्होंने संगीत-दामोदर नामक संगीत की एक पुस्तक का संकलन किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)