श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.10.115 
विद्यापति, चण्डीदास, श्री - गीत - गोविन्द ।
एइ तिन गीते करा’न प्रभुर आनन्द ॥115॥
 
 
अनुवाद
श्री स्वरूप दामोदर विद्यापति और चंडीदास की कविताएँ और जयदेव गोस्वामी की श्री गीता-गोविंद पढ़ते थे। वह इन गीतों को गाकर श्री चैतन्य महाप्रभु को बहुत प्रसन्न करते थे।
 
He used to read the songs of Shri Swaroop Damodar Vidyapati and Chandidas and Shri Geet Govind written by Jaydev Goswami. He used to make Sri Chaitanya Mahaprabhu very happy by singing these songs.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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