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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  2.10.114 
अतएव स्वरूप आगे करे परीक्षण ।
शुद्ध हय यदि, प्रभुरे करा’न श्रवण ॥114॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर गोस्वामी की यह परंपरा थी कि वे सभी साहित्यों का परीक्षण करके यह पता लगाते थे कि उनके निष्कर्ष सही हैं या नहीं। तभी वे उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु को सुनाने देते थे।
 
Svarupa Damodara Goswami would examine all literature to determine whether his conclusions were correct. Only then would he allow it to be recited to Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि अगर कुछ भक्ति साधना को बाधित करता है, तो इसे अशुद्ध समझना चाहिए। भगवान के शुद्ध भक्त अशुद्ध सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करते हैं। अशुद्ध भक्त रसअभास या परस्पर विरोधी भावों, और भक्ति पथ के विपरीत अन्य सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं। ऐसे अशुद्ध सिद्धांतों का पालन करने वालों को कभी भी शुद्ध भक्त नहीं माना जाता है। रसअभास के पथ का अनुसरण करने वाले कई दल हैं, और उनके अनुयायियों को कई बार सामान्य लोग पूजते हैं। रसअभास और भक्ति-सिद्धांत-विरुद्ध के निष्कर्षों को अपनाने वालों को कभी भी श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्त नहीं माना जाता है। स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने कभी भी ऐसे अनुयायियों को गौड़ीय वैष्णव के रूप में स्वीकार नहीं किया, और न ही उन्होंने उन्हें सर्वोच्च भगवान, श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने की अनुमति दी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)