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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु भक्ति के निर्णायक कथनों के विपरीत ग्रंथों या श्लोकों को सुनने में कभी प्रसन्न नहीं होते थे। भगवान को रसाभास, अर्थात् दिव्य मधुरता का मिश्रण, सुनना पसंद नहीं था।
Sri Chaitanya Mahaprabhu never wanted to listen to books or verses that were contrary to the principles of devotion. He also did not want to hear rasabhasa, or transgressions of the divine essences.
तात्पर्य
भक्ति-सिद्धांत-विरुद्ध उस उसूल के खिलाफ है जो कि विविधता में एकता का है, जिसे कि दार्शनिक रूप से अचिंत्य-भेदाभेद कहते हैं- यानी एकता और भिन्नता एक ही समय में - जबकि रसाभास वो चीज है जो कि पारलौकिक रस लग सकती है लेकिन असल में वो है नहीं। वो शुद्ध वैष्णव को इन दोनों चीजों से बचना चाहिए जो कि भक्ति भाव के पूरी तरह विरुद्ध हैं। ये भ्रांतियां असल में मायावाद दर्शन के जैसे ही हैं। अगर कोई मायावाद दर्शन में पड़ जाता है, तो वो धीरे-धीरे भक्ति भाव प्लेटफॉर्म से नीचे गिरने लगता है। रसों को ओवरलैप करने से (रसाभास) अंततः कोई प्राकृत सहजिया बन जाता है और सबकुछ बहुत ही आसान समझने लगता है। कोई बाउल समुदाय का सदस्य भी बन सकता है और धीरे-धीरे आकर्षित होना शुरू कर देता है भौतिक गतिविधियों की तरफ। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें भक्ति-सिद्धांत-विरुद्ध और रसाभास से दूर रहने की सलाह दी है। इस तरह से भक्त शुद्ध रह सकता है और पतन से मुक्त। हर किसी को भक्ति-सिद्धांत-विरुद्ध और रसाभास से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥