श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.10.111 
कृष्ण - रस - तत्त्व - वेत्ता, देह - प्रेम - रूप ।
साक्षात्महाप्रभुर द्वितीय स्वरूप ॥111॥
 
 
अनुवाद
श्रीस्वरूप दामोदर परमानंद प्रेम के साक्षात् स्वरूप थे, जो कृष्ण के साथ संबंध में व्याप्त दिव्य मधुरता से पूर्णतः परिचित थे। वे श्रीचैतन्य महाप्रभु के दूसरे अंश के रूप में प्रत्यक्ष रूप से उनके प्रतीक थे।
 
Sri Swarupa Damodara was the embodiment of love and possessed the full knowledge of Krishna's essence. He was a direct representative of the second expansion of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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