श्री भगवान उवाच
अनाश्रितः कर्म-फलं कार्यं कर्म करोति यः
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः
"भगवान श्रीकृष्ण ने कहा," जो व्यक्ति अपने कार्य के फल के प्रति आसक्त नहीं होता और वह जैसे बाध्य होता है कार्य करता है, वह जीवन में संन्यासी है और सच्चा रहस्यवादी है, न कि वह जो आग नहीं जलाता और कोई काम नहीं करता है। "
