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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 10: महाप्रभु का जगन्नाथ पुरी लौट आना  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.10.102 
आर दिने आइला स्वरूप दामोदर ।
प्रभुर अत्यन्त मर्मी, रसेर सागर ॥102॥
 
 
अनुवाद
अगले दिन स्वरूप दामोदर भी आ पहुँचे। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यंत घनिष्ठ मित्र थे और दिव्य मधुरता के सागर थे।
 
The next day, Swarupa Damodara also arrived. He was a close friend of Sri Chaitanya Mahaprabhu and an ocean of divine essences.
तात्पर्य
"स्वरूप" शंकराचार्य के शिष्य-परंपरा में ब्रह्मचारी के नामों में से एक है। वैदिक साधना में संन्यासियों के लिए दस नाम हैं, और तीर्थ या आश्रम पदवी के किसी संन्यासी की सहायता करने वाले ब्रह्मचारी को स्वरूप की उपाधि प्राप्त करने की परंपरा है। दामोदर स्वरूप पहले नवद्वीप के निवासी थे, और उनका नाम पुरुषोत्तम आचार्य था। जब वे वाराणसी गए, तो उन्होंने तीर्थ पदवी वाले एक संन्यासी से संन्यास ग्रहण किया। यद्यपि उन्हें ब्रह्मचारी अवस्था में स्वरूप की उपाधि प्राप्त हुई थी, उन्होंने संन्यास लेने पर अपना नाम नहीं बदला। वास्तव में, एक संन्यासी के रूप में उन्हें तीर्थ कहलाया जाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने अपने मूल ब्रह्मचारी उपाधि स्वरूप को ही बनाए रखना चुना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)