श्री चैतन्य महाप्रभु भली प्रकार जानते थे कि उनका संन्यास ग्रहण करना उनकी माता के लिये वज्रपात के समान है। अतः उन्होंने माँ और मायापुर के भक्तों को बुलाया, और श्री अद्वैत आचार्य के प्रबंध से उन्होंने संन्यास ग्रहण करने के बाद उनसे आखिरी बार भेंट की। माँ को यह देखकर अत्यधिक दुःख हुआ कि उन्होंने अपना सिर मुंडा लिया है। उनके सिर पर अब कोई सुंदर बाल नहीं थे। माँ शची को सभी भक्तों ने समझाया, और श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे उनके लिये भोजन बनाने को कहा क्योंकि उन्होंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया था और उन्हें बहुत भूख लगी थी। माँ ने तुरंत सहमति दे दी और बाकी सब कुछ भूलकर, वे श्री चैतन्य महाप्रभु के लिये भोजन बनाती रहीं, जब तक वे श्री अद्वैत प्रभु के घर पर थीं। फिर, कुछ दिनों बाद, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता से जगन्नाथ पुरी जाने की अनुमति माँगी। माता के आग्रह पर, जगन्नाथ पुरी को उन्होंने संन्यास ग्रहण करने के बाद अपना मुख्यालय बनाया। इस प्रकार, सब कुछ ठीक हो गया, और माता की अनुमति से श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी की ओर बढ़े।
