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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  2.1.91 
प्रथम सूत्र प्रभुर सन्न्यास - करण ।
सन्न्यास करि’ चलिला प्रभु श्री - वृन्दावन ॥91॥
 
 
अनुवाद
यह पहला सारांश है: संन्यास आश्रम स्वीकार करने के बाद, चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन की ओर चले गए।
 
The first sutra is this: After taking sannyasa, Sri Chaitanya Mahaprabhu started towards Vrindavan.
तात्पर्य
स्पष्ट रूप से ये कथन श्री चैतन्य महाप्रभु के त्याग किए हुए जीवन की व्यवस्था को स्वीकार करने का वास्तविक लेखा-जोखा है। इस त्याग किए हुए जीवन की उनकी स्वीकृति किसी भी तरह से मायावादी संन्यास को स्वीकार करने के लिए तुलनीय नहीं है। संन्यास स्वीकार करने के बाद, चैतन्य महाप्रभु वृंदावन जाना चाहते थे। वह मायावादी संन्यासियों से भिन्न थे, जो निरपेक्ष अस्तित्व में विलीन होना चाहते हैं। वैष्णवों के लिए, संन्यास को स्वीकार करने का अर्थ है सभी भौतिक गतिविधियों से मुक्ति प्राप्त करना और स्वयं को प्रभु की पारलौकिक प्रेम भक्ति के लिए पूरी तरह से समर्पित करना। इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी (B.r.s. 1.2.255) ने की है: anāsaktasya viṣayān yathārham upayuñjataḥ/ nirbandhaḥ kṛṣṇa-sambandhe yuktaṁ vairāgyam ucyate। एक वैष्णव के लिए, त्याग किए हुए जीवन का अर्थ है भौतिक चीजों के प्रति लगाव को पूरी तरह से त्याग देना और प्रभु की पारलौकिक प्रेम भक्ति में निरंतर संलग्न रहना। हालाँकि, मायावादी संन्यासी नहीं जानते कि प्रभु की सेवा में प्रत्येक चीज़ को कैसे संलग्न किया जाए। क्योंकि उनका कोई भक्ति प्रशिक्षण नहीं है, इसलिए वह भौतिक वस्तुओं को अछूत समझते हैं। ब्रह्म सत्यं जगन मिथ्या: मायावादी मानते हैं कि संसार झूठा है, लेकिन वैष्णव संन्यासी ऐसा नहीं सोचते हैं। वैष्णव कहते हैं, "संसार झूठा क्यों होना चाहिए? यह वास्तविकता है, और यह भगवान के परम व्यक्तित्व की सेवा के लिए है।" एक वैष्णव संन्यासी के लिए, त्याग का अर्थ है व्यक्तिगत इंद्रियों के सुख के लिए कुछ भी स्वीकार नहीं करना। भक्ति सेवा का अर्थ है भगवान के परम व्यक्तित्व की संतुष्टि के लिए सब कुछ लगाना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)