श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  2.1.89 
सन्न्यास करि’ चब्बिश वत्सर कैला ये ये कर्म ।
अनन्त, अपार - तार के जानिबे मर्म ॥89॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास आश्रम ग्रहण करने के पश्चात् चौबीस वर्षों तक जो भी लीलाएँ कीं, वे असीम एवं अथाह थीं। ऐसी लीलाओं का तात्पर्य कौन समझ सकता है?
 
The divine acts performed by Sri Chaitanya Mahaprabhu for twenty-four years after taking sannyasa were countless and immense. Who can understand the essence of such acts?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)