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अनुवाद
जिस प्रकार श्रीमती राधारानी उद्धव की उपस्थिति में भौंरे से असंगत बातें करती थीं, उसी प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु भी अपने परमानंद में दिन-रात पागलपन और असंगत बातें करते रहते थे।
Just as Srimati Radharani babbled incoherently like a bee in the presence of Uddhava, Sri Chaitanya Mahaprabhu spoke incoherently day and night like a madman in a state of emotional rage.
तात्पर्य
यह उन्मद (पागलपन) साधारण पागलपन नही है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु अतार्किक रूप से बोलते थे, लगभग एक पागल की तरह, वे प्रेम की अलौकिक परमानंद में थे। उच्चतम अलौकिक परमानंद में, मोहक की उपस्थिति में मोहित होने की भावना होती है। जब मोहक और मोहित अलग हो जाते हैं, तो मोहन, या विस्मय, होता है। जब अलग होने के कारण इतने विस्मय में, व्यक्ति स्तब्ध हो जाता है, और उस समय अलौकिक परमानंद के सभी शारीरिक लक्षण प्रकट होते हैं। जब वे प्रकट होते हैं, तो व्यक्ति अकल्पनीय रूप से पागल प्रतीत होता है। इसे अलौकिक पागलपन कहा जाता है। इस अवस्था में, कल्पनाशील वचन होते हैं, और व्यक्ति पागल के समान भावनाओं का अनुभव करता है। श्रीमति राधारानी के पागलपन को कृष्ण को उद्धव ने समझाया, जिन्होंने कहा, "मेरे प्रिय कृष्ण, आपसे अत्यधिक वियोग की भावनाओं के कारण, श्रीमति राधारानी कभी वन के खंडों में अपना बिस्तर बनाती हैं, कभी नीले बादल को फटकारती हैं, और कभी घने अंधेरे में भटकती रहती है। वन। इस प्रकार वह एक पागल औरत की तरह बन गई है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥