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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  2.1.82 
तोमार चरण मोर व्रज - पुर - घरे ।
उदय करये यदि, तबे वाञ्छा पूरे ॥82॥
 
 
अनुवाद
गोपियों ने सोचा, "हे प्रभु, यदि आपके चरण कमल पुनः वृन्दावन में हमारे घर आएँ, तो हमारी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।"
 
The Gopis thought, “O Lord! If your lotus feet were to visit our homes in Vrindavan again, our wishes would be fulfilled.”
तात्पर्य
अपने अनुभाष्य में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं, "गोपियाँ बिना उद्देश्य के भगवान की सेवा में पूर्ण रूप से लिप्त हैं। वे कृष्ण की संपन्नता से नहीं, और न ही इस समझ से कि वह भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, मोहित हैं।" स्वाभाविक रूप से गोपियाँ कृष्ण से प्रेम करने के लिए इच्छुक थीं, क्योंकि वह वृंदावन गाँव के एक आकर्षक युवा लड़के थे। ग्रामीण लड़कियां होने के नाते, वे कुरुक्षेत्र के उस क्षेत्र से बहुत अधिक आकर्षित नहीं थीं, जहाँ कृष्ण हाथी, घोड़े और शाही पोशाक के साथ मौजूद थे। वास्तव में, वे उस वातावरण में कृष्ण की बहुत ज्यादा सराहना नहीं करती थीं। कृष्ण गोपियों के ऐश्वर्य या व्यक्तिगत सुंदरता से नहीं, बल्कि उनकी शुद्ध भक्ति सेवा से आकर्षित थे। इसी तरह, गोपियाँ कृष्ण के प्रति एक ग्वाले के लड़के के रूप में आकर्षित थीं, परिष्कृत वेशभूषा में नहीं। भगवान कृष्ण अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली हैं। उन्हें समझने के लिए, महान योगी और संत व्यक्ति सभी भौतिक व्यस्तताओं को त्याग देते हैं और उनका ध्यान करते हैं। इसी तरह, जो लोग भौतिक भोग, भौतिक ऐश्वर्य की वृद्धि, परिवार के भरण-पोषण या इस भौतिक दुनिया की उलझनों से मुक्ति के लिए अत्यधिक आकर्षित होते हैं, वे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का आश्रय लेते हैं। लेकिन गोपियों को ऐसी गतिविधियों और प्रेरणाओं का पता नहीं है; वे ऐसी शुभ गतिविधियों को करने में बिल्कुल भी विशेषज्ञ नहीं हैं। पहले से ही आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध होकर, वे बस अपनी शुद्ध इंद्रियों को वृंदावन के दूरस्थ गाँव में भगवान की सेवा में लगाते हैं। गोपियाँ शुष्क अटकलों, कलाओं, संगीत या भौतिक जीवन की अन्य स्थितियों में रुचि नहीं रखती हैं। वे भौतिक भोग और त्याग की सभी समझ से रहित हैं। उनकी एकमात्र इच्छा कृष्ण को वापस लौटते हुए और उनके साथ आध्यात्मिक, दिव्य मनोरंजन का आनंद लेते हुए देखना है। गोपियाँ बस यही चाहती हैं कि वह वृंदावन में रहे ताकि वे उनकी खुशी के लिए, उनकी सेवा कर सकें। व्यक्तिगत संतुष्टि का भाव भी नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)