श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  2.1.76 
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्र - मिलितस् तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गम - सुखम् ।
तथाप्यन्तः - खेलन्मधुर - मुरली - पञ्चम - जुषे मनो मे कालिन्दी - पुलिन - विपिनाय स्पृहयति ॥76॥
 
 
अनुवाद
[यह श्रीमती राधारानी द्वारा उच्चारित एक श्लोक है।] "मेरे प्रिय मित्र, अब मैं कुरुक्षेत्र के इस मैदान में अपने अत्यंत प्राचीन और प्रिय मित्र कृष्ण से मिल चुकी हूँ। मैं वही राधारानी हूँ, और अब हम मिल रहे हैं। यह बहुत सुखद है, फिर भी मैं यमुना के तट पर वन के वृक्षों के नीचे जाना चाहती हूँ। मैं वृंदावन के उस वन में उनकी मधुर बांसुरी की पंचम ध्वनि सुनना चाहती हूँ।"
 
[This is a verse spoken by Srimati Radharani.] “O dear friend, I have now met my very old and dear friend Krishna in this Kurukshetra. I am the same Radharani, and now we are meeting. This is very pleasant, but even now my heart yearns to sit on the banks of the Yamuna, under the trees of the forest there. I long to hear the sound of His sweet flute resonating in the fifth note within the forest of Vrindavan.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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