हरिदास ठाकुर आर रूप - सनातन ।
जगन्नाथ - मन्दिरे ना या’न तिन जन ॥63॥
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अनुवाद
अशांति से बचने के लिए, तीन महान हस्तियों - हरिदास ठाकुर, श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी - ने जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं किया।
To avoid any conflict, Srila Haridas Thakur, Srila Rupa Goswami and Srila Sanatana Goswami – these three great devotees did not enter the Jagannath Temple.
तात्पर्य
आज भी यह जगन्नाथ मंदिर में प्रचलन है कि उन लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती है जो सख्ती से हिंदू धर्म के रूप में जानी जाने वाली वैदिक संस्कृति का पालन नहीं करते हैं। श्रील हरिदास ठाकुर, श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी का मुसलमानों के साथ पहले से घनिष्ठ संबंध था। हरिदास ठाकुर एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुए थे, और श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी, हिंदू समाज में अपने सामाजिक दर्जे को त्याग कर, मुस्लिम सरकार में मंत्री नियुक्त किए गए थे। उन्होंने अपने नाम भी बदलकर दबीरा खास और साकरा मल्लिका रख लिया था। इस प्रकार उन्हें ब्राह्मण समाज से कथित तौर पर निष्कासित कर दिया गया था। नतीजतन, विनम्रता के कारण उन्होंने जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं किया, हालांकि भगवान का व्यक्तित्व, जगन्नाथ, चैतन्य महाप्रभु के रूप में, हर दिन उनसे मिलने आते थे। इसी तरह, इस कृष्ण चेतना समाज के सदस्यों को कभी-कभी भारत के कुछ मंदिरों में प्रवेश से मना कर दिया जाता है। जब तक हम हरे कृष्ण मंत्र का जाप करते रहेंगे, तब तक हमें इस बारे में दुखी नहीं होना चाहिए। कृष्ण स्वयं उन भक्तों से जुड़ते हैं जो उनके पवित्र नाम का जाप करते हैं, और एक निश्चित मंदिर में प्रवेश करने में सक्षम नहीं होने पर दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह के हठधर्मी निषेध को भगवान चैतन्य महाप्रभु ने स्वीकार नहीं किया था। जिन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने के लिए अयोग्य समझा जाता था, उनसे चैतन्य महाप्रभु रोजाना मिलते थे, और यह दर्शाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने इन निषेधों को स्वीकार नहीं किया था। हालाँकि, अनावश्यक उथल-पुथल से बचने के लिए, ये महान व्यक्ति जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं करते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥