कामं क्रोधं भयं स्नेहमेक्यं सौहृदमेव च
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते
काम शब्द का अर्थ है विकारी इच्छा, भय का अर्थ है डर, और क्रोध का अर्थ है गुस्सा। अगर कोई किसी भी तरह या दूसरे तरीके से कृष्ण के पास जाए, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। गोपियां विकारी इच्छा के साथ कृष्ण के पास गईं थीं। कृष्ण बहुत सुंदर बालक थे और गोपियाँ उनसे मिलने और उनकी संगति का आनंद लेना चाहती थीं। लेकिन यह विकारी इच्छा सांसारिक इच्छा से अलग होती है। यह सांसारिक इच्छा की तरह लगती है, लेकिन वास्तव में यह कृष्ण के प्रति आकर्षण का सर्वोच्च रूप है। चैतन्य महाप्रभु एक संन्यासी थे; उन्होंने घर और दूसरी सब चीजें छोड़ दीं थी। उन्हें किसी भी तरह की सांसारिक विकारी इच्छाओं से प्रेरित नहीं किया जा सकता था। इसलिए जब उन्होंने मादन-दाहने ("विकारी इच्छा की आग में") शब्द का प्रयोग किया, तो उनका अर्थ था कि कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम के कारण वे कृष्ण से अलग होने की आग में जल रहे थे। जब भी वे मंदिर में या रथ-यात्रा के दौरान जगन्नाथ से मिलते थे, तब चैतन्य महाप्रभु यह सोचते थे, ''अब मुझे अपने जीवन और आत्मा का भगवान मिल गया है। ''
