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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.1.51 
शेष आर येइ रहे द्वादश वत्सर ।
कृष्णेर विरह - लीला प्रभुर अन्तर ॥51॥
 
 
अनुवाद
अंतिम बारह वर्ष भगवान के हृदय में विरहपूर्वक कृष्ण की लीलाओं का आनन्द लेने में ही व्यतीत हुए।
 
Mahaprabhu spent his last twelve years simply enjoying the love of Krishna's separation within his heart.
तात्पर्य
श्री कृष्‍ण चैतन्य महाप्रभु कृष्‍ण से बिछड़ने की भावना से गोपियों की स्थिति का आनंद लेते थे। जब कृष्‍ण गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गए तो गोपियां अपने पूरे जीवन उनसे विरह की पीड़ा से रोती रहीं। विरह की यह भावना श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने व्यक्तिगत आचरण से विशेष रूप से प्रचार की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)