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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.1.44 
गोपाल - चम्पू - नामे ग्रन्थ - महाशूर ।
नित्य - लीला स्थापन याहे व्रज - रस - पूर ॥44॥
 
 
अनुवाद
गोपाल-कम्पू नामक ग्रन्थ सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महान दिव्य साहित्य है। इस ग्रन्थ में भगवान की शाश्वत लीलाओं का वर्णन है तथा वृन्दावन में भोगी गई दिव्य लीलाओं का पूर्ण वर्णन है।
 
Gopal Champu is the most famous and influential divine text. It establishes the eternal pastimes of the Lord and describes in detail the divine pleasures enjoyed in Vrindavan.
तात्पर्य
अनुभाष्य में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर गोपाल-चम्पू के बारे में निम्नलिखित जानकारी देते हैं। गोपाल-चम्पू दो भागों में विभाजित है। पहले भाग को पूर्वी तरंग और दूसरे भाग को उत्तरी तरंग कहा जाता है। पहले भाग में तैंतीस प्रार्थनाएँ हैं और दूसरे भाग में सैंतीस प्रार्थनाएँ हैं। 1510 शकाब्द (ई. 1588) में पूरा हुए पहले भाग में, निम्नलिखित विषयों पर विचार-विमर्श किया गया है: (1) वृन्दावन और गोलोक; (2) पूतना राक्षस का वध, माँ यशोदा के निर्देश पर गोपियों का घर लौटना, भगवान कृष्ण और बलराम का स्नान, स्निग्ध-कण्ठ और मधु-कण्ठ; (3) माँ यशोदा का स्वप्न; (4) जन्माष्टमी समारोह; (5) नंद महाराज और वसुदेव के बीच मुलाकात, और पूतना राक्षस का वध; (6) बिस्तर से जागने का मनोरंजन, शकट राक्षस का उद्धार, और नामकरण समारोह; (7) त्रनावर्त राक्षस का वध, भगवान कृष्ण का मिट्टी खाना, भगवान कृष्ण की बचपन की शरारत, और भगवान कृष्ण एक चोर के रूप में; (8) दही का मंथन, माँ यशोदा के स्तन से कृष्ण का दूध पीना, दही के बर्तन को तोड़ना, कृष्ण को रस्सियों से बाँधना, दो भाइयों (यमलार्जुन) का उद्धार और माँ यशोदा का विलाप; (9) श्री वृन्दावन में प्रवेश; (10) वत्सा असुर, बका असुर और व्योम असुर का वध; (11) अघासुर का वध और भगवान ब्रह्मा का चकराना; (12) जंगल में गायों की देखभाल; (13) गायों की देखभाल और कालिया नाग को दंडित करना; (14) गदभा असुर (गधे के राक्षस) का वध और कृष्ण की प्रशंसा; (15) गोपियों का पिछला आकर्षण; (16) प्रलाम्बा असुर का वध और जंगल की आग को खाना; (17) कृष्ण से संपर्क करने का गोपियों का प्रयास; (18) गोवर्धन पर्वत का उठाना; (19) कृष्ण को दूध से स्नान कराना; (20) नंद महाराज की वरुण की हिरासत से वापसी और गोपों द्वारा गोलोक वृन्दावन का दर्शन; (21) कात्यायनी-व्रत में अनुष्ठानों का प्रदर्शन और देवी दुर्गा की पूजा; (22) यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियों से भोजन की भीख मांगना; (23) कृष्ण और गोपियों की मुलाकात; (24) गोपियों के साथ कृष्ण का आनंद लेना, राधा और कृष्ण का दृश्य से गायब हो जाना, और गोपियों द्वारा उनकी खोज; (25) कृष्ण का फिर से प्रकट होना; (26) गोपियों का दृढ़ संकल्प; (27) यमुना के पानी में मनोरंजन; (28) नंद महाराज का नाग के चंगुल से उद्धार; (29) एकांत स्थानों में विभिन्न मनोरंजन; (30) शंखचूड और होली का वध; (31) अरिष्टासुर का वध; (32) केशी राक्षस का वध; (33) श्री नारद मुनि का प्रकट होना और उस वर्ष का वर्णन जिसमें पुस्तक पूरी हुई थी।

उत्तर-खंड के रूप में विख्यात दूसरे भाग में, निम्नलिखित विषयों पर चर्चा की गई है: (1) व्रज भूमि के प्रति आकर्षण; (2) अक्रूर के क्रूर कार्य; (3) कृष्ण के मथुरा के लिए प्रस्थान; (4) मथुरा नगर का वर्णन; (5) कंस का वध; (6) नंद महाराज का कृष्ण और बलराम से अलगाव; (7) कृष्ण और बलराम के बिना नंद महाराज का वृंदावन में प्रवेश; (8) कृष्ण और बलराम की पढ़ाई; (9) कृष्ण और बलराम के शिक्षक के पुत्र को कैसे लौटाया गया; (10) उद्धव का वृंदावन आगमन; (11) राधारानी की दूत भ्रमर से बातचीत; (12) उद्धव का वृंदावन से लौटना; (13) जरासंध का बंधन; (14) यवन जरासंध का वध; (15) बलराम का विवाह; (16) रुक्मिणी का विवाह; (17) सात विवाह; (18) नरकासुर का वध, स्वर्ग से पारिजात फूल लाना और कृष्ण का 16,000 राजकुमारियों से विवाह; (19) बाणासुर पर विजय; (20) बलराम की व्रज वापसी का वर्णन; (21) पौंड्रक (अनुकरण विष्णु) का वध; (22) द्विविद का वध और हस्तिनापुर के विचार; (23) कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान; (24) कुरुक्षेत्र में वृंदावन और द्वारका के निवासियों का मिलना; (25) उद्धव के साथ कृष्ण का परामर्श; (26) राजा की मुक्ति; (27) राजसूय यज्ञ का प्रदर्शन; (28) शाल्व का वध; (29) कृष्ण के वृंदावन लौटने का विचार; (30) कृष्ण का वृंदावन पुनरागमन; (31) श्रीमती राधारानी और अन्य द्वारा बाधाओं का समायोजन; (32) सब कुछ पूरा हुआ; (33) राधा और माधव का निवास; (34) श्रीमती राधारानी और कृष्ण को सजाना; (35) श्रीमती राधारानी और कृष्ण का विवाह समारोह; (36) श्रीमती राधारानी और कृष्ण का मिलन; और (37) गोलोक में प्रवेश।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)