दक्षिण-विभाग (दक्षिणी भाग) में, भक्ति-रस नामक भावना (संबंध) का एक सामान्य विवरण है, जो भक्ति सेवा से प्राप्त होता है। इस उच्च स्तर की भक्ति सेवा पर, विभावा, अनुभावा, सात्विका, व्यभिचारी और स्थाई-भाव जैसे चरणों का भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार, दक्षिण-विभाग में पांच लहरें हैं। पश्चिमी विभाग (पश्चिम-विभाग) में, भक्ति सेवा से प्राप्त होने वाले मुख्य आध्यात्मिक रसों का वर्णन किया गया है। इन्हें मुख्य-भक्ति-रस-निरूपण या भक्ति सेवा के निष्पादन में प्रमुख रसों या भावनाओं की प्राप्ति के रूप में जाना जाता है। उस भाग में तटस्थता में भक्ति सेवा, प्रेम और स्नेह (दासीपन कहलाने वाली) में आगे विकास, भाईचारे में आगे विकास, माता-पिता के प्यार में आगे विकास और अंत में कृष्ण और उनके भक्तों के बीच दांपत्य प्रेम का वर्णन है। इस प्रकार, पश्चिमी विभाग में पाँच लहरें हैं।
उत्तरी विभाग (उत्तर-विभाग) में, भक्ति सेवा के अप्रत्यक्ष भावों का वर्णन है - अर्थात्, हँसी में भक्ति सेवा, आश्चर्य में भक्ति सेवा और वीरता, दया, क्रोध, भय और भयावहता में भक्ति सेवा। भावों का मिश्रण और विभिन्न मनोगतियों के उल्लंघन भी हैं। इस प्रकार, इस भाग में नौ लहरें हैं। भक्ति-रसामृत-सिंधु की तो यह बस एक संक्षिप्त रूपरेखा है।
विदग्ध-माधव वृंदावन में भगवान कृष्ण के लीलाओं का एक नाटक है। श्रील रूप गोस्वामी ने यह पुस्तक 1454 शकाब्द (1532 ई.) में समाप्त की थी। इस नाटक का पहला भाग वेंणु-नाद-विलास, दूसरा भाग मनमथ-लेख, तीसरा भाग राधा-संग, चौथा भाग वेंणु-हरण, पाँचवा भाग राधा-प्रसादन, छठा भाग शरद-विहार और सातवां और अंतिम भाग गौरी-विहार कहलाता है।
उज्ज्वल-नीलमणि नामक एक पुस्तक भी है, जो प्रेमपूर्ण मामलों का एक अलौकिक विवरण है जिसमें रूपक, उपमा और उच्च भक्तिपूर्ण भावनाएँ शामिल हैं। भक्ति-रसामृत-सिंधु में दांपत्य प्रेम में भक्ति सेवा का संक्षिप्त वर्णन किया गया है, लेकिन उज्ज्वल-नीलमणि में इसकी बहुत विस्तृत चर्चा की गई है। यह पुस्तक विभिन्न प्रकार के प्रेमियों, उनके सहायकों और उन लोगों का वर्णन करती है जो कृष्ण को बहुत प्रिय हैं। इसमें श्रीमती राधारानी और अन्य महिला प्रेमियों के साथ-साथ विभिन्न समूह के नेताओं का भी वर्णन किया गया है। दूतों और निरंतर साथियों, साथ ही अन्य जो कृष्ण को बहुत प्रिय हैं, सभी का वर्णन किया गया है। पुस्तक यह भी बताती है कि कृष्ण के प्रति प्रेम कैसे जागृत होता है और परमानंद की स्थिति, भक्ति की स्थिति, स्थायी परमानंद, विचलित परमानंद, स्थिर परमानंद, विभिन्न वस्त्रों की विभिन्न स्थितियों, अलगाव की भावनाओं, पूर्व के आकर्षण, आकर्षण में क्रोध, प्रेम संबंधों की किस्में, प्रेमी से अलगाव, प्रेमी से मिलना और प्रेमी और प्रेमी के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार का आनंद का वर्णन करती है। यह सब बहुत विस्तार से वर्णित किया गया है।
इसी तरह, ललिता-माधव, द्वारका में कृष्ण के मनोविनोद का वर्णन है। इन मनोविनोदों को एक नाटक में बनाया गया था और यह कार्य वर्ष 1459 शकाब्दा में समाप्त किया गया था। पहले भाग में शाम के उत्सव, दूसरे भाग में शंखचूड़ का वध, तीसरे में श्रीमती राधारानी के पागलपन, चौथे में कृष्ण की ओर राधारानी के बढ़ने, पाँचवें में चंद्रावली की प्राप्ति, छठवें में ललिता की प्राप्ति, सातवें में नवा-वृंदावन में भेंट, आठवें में नवा-वृंदावन में आनंद, नौवें में चित्रों को देखना और दसवें में मन को पूरी तरह से संतुष्टि मिलने के बारे में बताया गया है। इस तरह, पूरे नाटक को दस भागों में बांटा गया है। लघु-भागवतामृत को दो भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग को "कृष्ण का अमृत" और दूसरे भाग को "भक्ति सेवा का अमृत" कहा जाता है। पहले भाग में वैदिक प्रमाणों के महत्व पर जोर दिया गया है, और इसके बाद सर्वोच्च भगवान के मूल रूप श्री कृष्ण के वर्णन, और उनके मनोविनोद और स्वाँश (व्यक्तिगत रूपों) और विभिन्न अंश में विस्तार का वर्णन किया गया है। अलग-अलग अवशोषणों के अनुसार, अवतारों को आवेश और तदात्म कहा जाता है। पहले अवतार को तीन पुरुषावतारों में विभाजित किया गया है - जैसे कि महा-विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरदकशायी विष्णु। फिर प्रकृति के तीनों अवतार - जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर (शिव) हैं। भगवान की सेवा में उपयोग की जाने वाली सभी सामग्री, इस भौतिक दुनिया के तीनों गुणों से परे, पारलौकिक है। पच्चीस लीला-अवतारों का भी वर्णन है, जैसे कि चतुःसन (कुमारों), नारद, वराह, मत्स्य, यज्ञ, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दत्तात्रेय, हयग्रीव, हंस, पृश्निगर्भ, ऋषभ, पृथु, नृसिंह, कूर्म, धन्वंतरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, दशरथी, कृष्ण-द्वैपायन, बलराम, वासुदेव, बुद्ध और कल्कि। चौदह मंवंतर अवतार भी हैं: यज्ञ, विभु, सत्यसेन, हरि, वैकुण्ठ, अजित, वामन, सर्वभौम, ऋषभ, विश्वसेन, धर्मसेतु, सुधामा, योगेश्वर और बृहद्भानु। चार युगों के लिए भी चार अवतार हैं, और उनके रंगों को सफेद, लाल, काला और काला (कभी-कभी पीला, जैसे कि भगवान चैतन्य महाप्रभु के मामले में) के रूप में वर्णित किया गया है। उन सहस्राब्दियों के लिए विभिन्न प्रकार के सहस्राब्द और अवतार हैं। आवेश, प्रभाव, वैभव और परा नामक श्रेणियाँ विभिन्न अवतारों के लिए अलग-अलग स्थितियों का निर्माण करती हैं। विशिष्ट मनोविनोद के अनुसार, नाम आध्यात्मिक रूप से सशक्त होते हैं। शक्तिशाली और शक्ति, और सर्वोच्च भगवान की अकल्पनीय गतिविधियों के बीच अंतर का भी वर्णन है।
श्री कृष्ण परमपुरुष भगवान है, उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं। वे सभी अवतारों के स्रोत हैं। लघु-भागवतामृत में उनके अंश अवतारों का वर्णन, निराकार ब्रह्मतेज (वास्तव में श्री कृष्ण का दिव्य तेज) का वर्णन, दो हाथों वाले सामान्य मनुष्य के रूप में श्री कृष्ण की लीलाओं की श्रेष्ठता आदि का वर्णन है। भगवान के द्विभुज रूप की तुलना में कुछ नहीं है। आध्यात्मिक दुनिया (वैकुण्ठ-जगत) में शरीर के स्वामी और स्वयं शरीर के बीच कोई भेद नहीं है। भौतिक दुनिया में शरीर के स्वामी को आत्मा कहा जाता है, और शरीर को भौतिक अभिव्यक्ति कहा जाता है। हालाँकि, वैकुण्ठ दुनिया में ऐसा कोई भेद नहीं है। भगवान श्री कृष्ण अजन्मे हैं, और एक अवतार के रूप में उनकी उपस्थिति सदा के लिए है। कृष्ण की लीलाओं को दो भागों में विभाजित किया गया है - प्रकट और अप्रकट। उदाहरण के लिए, जब कृष्ण इस भौतिक दुनिया में जन्म लेते हैं, तो उनकी लीलाओं को प्रकट माना जाता है। हालाँकि, जब वे गायब हो जाते हैं, तो किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह समाप्त हो गए हैं, क्योंकि उनकी लीलाएँ अप्रकट रूप में चल रही हैं। हालाँकि, विविध प्रकार के विनोद भक्तों और भगवान कृष्ण द्वारा उनकी प्रकट लीलाओं के दौरान आनंद लिए जाते हैं। आखिरकार, मथुरा, वृंदावन और द्वारका में उनकी लीलाएँ शाश्वत हैं और ब्रह्मांड के किसी भाग में सदा सर्वत्र चलती रहती हैं।
