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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.1.35 
हरि - भक्ति - विलास, आर भागवतामृत ।
दशम - टिप्पनी, आर दशम - चरित ॥35॥
 
 
अनुवाद
श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा संकलित कुछ पुस्तकें हरि-भक्ति-विलास, बृहद-भागवतामृत, दशम-तिप्पानि और दशम-चरित थीं।
 
Some of the books written by Srila Sanatana Goswami are Haribhakti-vilasa, Brihad Bhagavatamrita, Dashama-commentary and Dashama-charita.
तात्पर्य
भक्ति-रत्नाकर नामक ग्रन्थ की प्रथम तरंग में कहा गया है कि श्रीमद-भागवतं को श्री सनातन गोस्वामी ने विस्तृत अध्ययनपूर्वक समझा था और वैष्णव-तोषणी नामक अपनी टीका में उन्होंने उसे समझाया था। श्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से जो कुछ भी ज्ञान सीधे ग्रहण किया था, उसका प्रसारण उनकी विलक्षण सेवा द्वारा सारे विश्व में हुआ। श्री सनातन गोस्वामी ने अपनी वैष्णव-तोषणी टीका को सम्पादन के लिए श्रील जीव गोस्वामी को दिया था और श्रील जीव गोस्वामी ने इसका सम्पादन लघु-तोषणी नाम से किया था। जो लेखन उन्होंने तुरंत किया वह शक वर्ष 1476 (ई.1554) में समाप्त हुआ। श्रील जीव गोस्वामी ने शकाब्द 1504 (ई.1582) में लघु-तोषणी को पूरा किया।

हरि-भक्ति-विलास का विषय, श्री सनातन गोस्वामी द्वारा, श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा एकत्रित किया गया था और इसे वैष्णव-स्मृति के रूप में जाना जाता है। यह वैष्णव-स्मृति-ग्रंथ बीस अध्यायों में समाप्त हुआ, जिसे विलास के रूप में जाना जाता है। पहले विलास में इस बात का वर्णन है कि आध्यात्मिक गुरु और शिष्य के बीच कैसे संबंध स्थापित होता है, और मंत्रों को समझाया जाता है। दूसरे विलास में, दीक्षा की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। तीसरे विलास में, वैष्णव व्यवहार के तरीके दिए गए हैं, जिसमें स्वच्छता, सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान का निरंतर स्मरण और दीक्षा देने वाले आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिए गए मंत्रों का जाप पर जोर दिया गया है। चौथे विलास में संस्कार, सुधारात्मक विधि; तिलक, शरीर के बारह स्थानों पर बारह तिलक लगाना; मुद्रा, शरीर पर निशान; माला, मोतियों से जप; और गुरु-पूजा, आध्यात्मिक गुरु की पूजा का वर्णन है। पाँचवें विलास में, ध्यान के लिए बैठने का स्थान बनाने के बारे में निर्देश दिया गया है, और साँस लेने के व्यायाम, ध्यान और भगवान विष्णु के शालग्राम-शिला प्रतिनिधित्व की पूजा का वर्णन है। छठे विलास में, भगवान के पारलौकिक रूप को आमंत्रित करने और उन्हें स्नान कराने के लिए आवश्यक अभ्यास दिए गए हैं। सातवें विलास में, भगवान विष्णु की पूजा में उपयोग किए जाने वाले फूलों को कैसे इकट्ठा किया जाए, इसके बारे में निर्देश दिया गया है। आठवें विलास में, देवता का वर्णन है और धूप जलाने, दीप जलाने, प्रसाद चढ़ाने, नृत्य करने, संगीत बजाने, ढोल बजाने, देवता को माला पहनाने, प्रार्थना और प्रणाम करने और अपराधों का प्रतिकार करने के निर्देश हैं। नौवें विलास में, तुलसी के पत्ते इकट्ठा करने, वैष्णव कर्मकांडों के अनुसार पूर्वजों को तर्पण देने और भोजन अर्पित करने के बारे में वर्णन है। दसवें विलास में भगवान के भक्तों (वैष्णवों या संत व्यक्तियों) का वर्णन है। ग्यारहवें विलास में, देवता पूजा और भगवान के पवित्र नाम की महिमा का विस्तृत विवरण है। देवता के पवित्र नाम का जप करने के तरीके के बारे में निर्देश दिया गया है, और पवित्र नाम का जप करते समय किए गए अपराधों के बारे में चर्चा है, साथ ही ऐसे अपराधों से राहत पाने के तरीके भी बताए गए हैं। भक्ति सेवा और समर्पण प्रक्रिया की महिमा का भी वर्णन है। बारहवें विलास में एकादशी का वर्णन है। तेरहवें विलास में, उपवास की चर्चा की गई है, साथ ही महा-द्वादशी समारोह का पालन भी किया गया है। चौदहवें विलास में, विभिन्न महीनों के लिए अलग-अलग कर्तव्यों की रूपरेखा तैयार की गई है। पंद्रहवें विलास में, बताया गया है कि एकादशी का व्रत पानी भी न पिए बिना कैसे किया जाए। विष्णु के प्रतीकों के साथ शरीर को चिन्हित करने का वर्णन, बारिश के मौसम के दौरान चातुर्मास्य पालन की चर्चा, और जन्माष्टमी, पार्श्वैकादशी, श्रवण-द्वादशी, राम-नवमी और विजया-दशमी की चर्चा है। सोलहवें विलास में कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) महीने में पालन किए जाने वाले कर्तव्यों पर चर्चा की गई है, या दामोदर महीना, या उर्जा, जब दीप देवता कक्ष में या मंदिर के ऊपर अर्पित किए जाते हैं। गोवर्धन-पूजा और रथ-यात्रा का भी वर्णन है। सत्रहवें विलास में देवता पूजा, महा-मंत्र जप और जप की प्रक्रिया की तैयारी पर चर्चा की गई है। अठारहवें विलास में श्री विष्णु के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। उन्नीसवें विलास में स्थापना से पहले देवता की स्थापना और देवता को स्नान कराने में किए जाने वाले अनुष्ठानों की चर्चा है। बीसवें विलास में मंदिरों के निर्माण पर चर्चा की गई है, जो कि महान भक्तों द्वारा निर्मित लोगों का जिक्र करते हैं।

हरी-भक्ति-विलास-ग्रंथ का विवरण श्री कविराज गोस्वामी ने मध्य-लीला (२४.३२९-३४५) में दिया है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा उन छंदों में दिए गए विवरण वास्तव में गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा संकलित उन अंशों का विवरण है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार, गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा संकलित भक्ति सेवा के नियमन सिद्धांत हमारे वैष्णव सिद्धांतों का सख्ती से पालन नहीं करते हैं। वास्तव में, गोपाल भट्ट गोस्वामी ने हरी-भक्ति-विलास से वैष्णव नियमन सिद्धांतों के विस्तृत विवरणों का केवल एक सारांश एकत्र किया था। हालाँकि, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी की राय है, कि हरी-भक्ति-विलास का सख्ती से पालन करना वास्तव में वैष्णव अनुष्ठानों का सही क्रम में पालन करना है। उनका दावा है कि स्मार्त-समाज, जिसका जाति के ब्राह्मणों द्वारा सख्ती से पालन किया जाता है, ने उन अंशों को प्रभावित किया है जिन्हें गोपाल भट्ट गोस्वामी ने मूल हरी-भक्ति-विलास से एकत्र किया था। इसलिए गोपाल भट्ट गोस्वामी की पुस्तक से वैष्णव निर्देशों का पता लगाना बहुत मुश्किल है। हरी-भक्ति-विलास के लिए संतान गोस्वामी द्वारा स्वयं की गई टीका को दिग-दर्शिनी-टीका के नाम से देखना बेहतर है। कुछ लोग कहते हैं कि वही टीका गोपीनाथ-पूजा अधिकारी द्वारा संकलित की गई थी, जो श्री राधा-रमणाजी की सेवा में लगे हुए थे और जो गोपाल भट्ट गोस्वामी के शिष्यों में से एक थे।

बृहद-भागवतामृत के संबंध में, दो भाग हैं, जिनमें से दोनों भक्ति सेवा के निर्वहन से संबंधित हैं। पहला भाग भक्ति सेवा का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है, जिसमें पृथ्वी, आकाशीय ग्रह, ब्रह्म-लोक और वैकुण्ठ-लोक सहित विभिन्न ग्रहों का भी विवरण है। अंतरंग भक्तों, सबसे अंतरंग भक्तों और पूर्ण भक्तों सहित भक्तों के भी वर्णन हैं। दूसरा भाग आध्यात्मिक दुनिया की महिमा का वर्णन करता है, जिसे गोलोक-माहात्म्य-निरूपण के रूप में जाना जाता है, साथ ही भौतिक दुनिया के त्याग की प्रक्रिया भी। यह वास्तविक ज्ञान, भक्ति सेवा, आध्यात्मिक दुनिया, ईश्वर के प्रति प्रेम, जीवन के गंतव्य की प्राप्ति और दुनिया के आनंद का भी वर्णन करता है। इस तरह हर भाग में सात अध्याय हैं, कुल मिलाकर चौदह अध्याय हैं।

दशम-टिप्पणी श्रीमद-भागवत के दशम स्कंध पर एक टीका है। इस टीका का एक और नाम बृहद-वैष्णव-तोषणी-टीका है। भक्ति-रत्नाकर में, यह कहा गया है कि दशम-टिप्पणी 1476 शकब्द (ई.1554) में समाप्त हुई थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)