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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.1.34 
प्रभु आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार ।
व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥34॥
 
 
अनुवाद
गोस्वामीगण ने समस्त गोपनीय वैदिक साहित्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर भक्ति का प्रचार कार्य किया। यह श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार था। इस प्रकार वृन्दावन की परम गोपनीय भक्ति को समझा जा सकता है।
 
These Goswamis propagated devotion based on an analytical study of all the esoteric Vedic literature. This was in fulfillment of Sri Chaitanya Mahaprabhu's command. Thus, one can understand the most profound devotion of Vrindavan.
तात्पर्य
यह सिद्ध करता है कि वास्तविक भक्ति सेवा वैदिक साहित्य के निष्कर्षों पर आधारित है। यह प्रकृति-सहजियाओं द्वारा प्रदर्शित भाव के प्रकार पर आधारित नहीं है। प्रकृति-सहजियाएं वैदिक साहित्य से परामर्श नहीं करतीं, और वे धूर्त, स्त्री-शिकार और गांजा लेने वाली होती हैं। कभी-कभी वे नाटकीय प्रदर्शन करते हैं और अपनी आंखों में आंसू लेकर भगवान को पुकारते हैं। बेशक, इन आंसुओं से सभी शास्त्रीय निष्कर्ष धुल जाते हैं। प्रकृति-सहजिया यह नहीं समझती हैं कि वे श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं, जिन्होंने विशेष रूप से कहा था कि वृंदावन और वृंदावन के लीलाओं को समझने के लिए किसी को शास्त्रों (वैदिक साहित्य) का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.2.12) में कहा गया है, भक्त्या श्रुत-गृहीतया। इसका मतलब है कि वैदिक ज्ञान से भक्ति प्राप्त होती है। तच्छ्रद्दधाना मुनायः। वास्तव में गंभीर भक्त वैदिक साहित्य (भक्त्या श्रुत-गृहीतया) सुनने से भक्ति, वैज्ञानिक भक्ति सेवा प्राप्त करते हैं। ऐसा नहीं है कि किसी को भावुकता से कुछ बनाना चाहिए, सहजिया बनना चाहिए और ऐसी मनगढ़ंत भक्ति सेवा की वकालत करनी चाहिए। हालाँकि, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने ऐसे सहजियाओं को निराकारवादियों से अधिक अनुकूल माना, जो निराशाजनक रूप से नास्तिक हैं। निराकारवादियों को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का कोई पता नहीं है। सहजियाओं की स्थिति मायावादी संन्यासियों से कहीं बेहतर है। हालाँकि सहजिया वैदिक ज्ञान के बारे में ज्यादा नहीं सोचते हैं, फिर भी उन्होंने भगवान कृष्ण को सर्वोच्च भगवान के रूप में स्वीकार किया है। दुर्भाग्य से, वे दूसरों को वास्तविक भक्ति सेवा से भटकाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)