नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद-धर्म-संस्थापकौ
लोकान्ाँ हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ
राधा-कृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
वन्दे रूप-सनातनाउ रघु-युगौ श्री-जीवा-गोपालकौ
छह गोस्वामी, श्रील रूप गोस्वामी और श्रील सनातन गोस्वामी के निर्देशन में, विभिन्न वैदिक साहित्य का अध्ययन किया और उनका सार, प्रभु की भक्ति सेवा को ग्रहण किया। इसका अर्थ है कि सभी गोस्वामी ने भक्ति सेवा पर वैदिक साहित्य के समर्थन से कई धर्मग्रंथ लिखे। भक्ति सेवा एक भावुक गतिविधि नहीं है। वैदिक ज्ञान का सार भक्ति सेवा है, जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की गई है: वेदिश्च सर्वैर अहम एव वेदयः। सभी वैदिक साहित्य का उद्देश्य कृष्ण को समझना है, और भक्ति सेवा के माध्यम से कृष्ण को कैसे समझा जाए यह श्रील रूप और सनातन गोस्वामी ने सभी वैदिक साहित्य के प्रमाण के साथ समझाया है। उन्होंने इसे इतनी अच्छी तरह से रखा है कि गोस्वामी के मार्गदर्शन में भक्ति सेवा से एक बदमाश या प्रथम श्रेणी के मूर्ख को भी मुक्ति मिल सकती है।
