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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.1.33 
नाना शास्त्र आ नि’ कैला भक्ति - ग्रन्थ सार ।
मूढ़ अधम - जनेरे तेंहो करिला निस्तार ॥33॥
 
 
अनुवाद
रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी दोनों ही वृंदावन में विभिन्न शास्त्र लेकर आए और भक्ति पर अनेक शास्त्रों का संकलन करके उनका सार एकत्रित किया। इस प्रकार उन्होंने सभी दुष्टों और पतित आत्माओं का उद्धार किया।
 
Both Rupa Goswami and Sanatana Goswami collected numerous scriptures in Vrindavan and presented their essence, compiling them into numerous devotional texts. Thus, they liberated all the wicked and fallen.
तात्पर्य
श्रील श्रीनिवास आचार्य ने गाया है:

नाना-शास्‍त्र-विचारणैक-निपुणौ सद-धर्म-संस्‍थापकौ

  लोकान्‍ाँ हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्‍यौ शरण्‍याकरौ

राधा-कृष्‍ण-पदारविन्द-भजनानन्‍देन मत्तालिकौ

  वन्दे रूप-सनातनाउ रघु-युगौ श्री-जीवा-गोपालकौ

छह गोस्‍वामी, श्रील रूप गोस्‍वामी और श्रील सनातन गोस्‍वामी के निर्देशन में, विभिन्‍न वैदिक साहित्‍य का अध्‍ययन किया और उनका सार, प्रभु की भक्ति सेवा को ग्रहण किया। इसका अर्थ है कि सभी गोस्‍वामी ने भक्ति सेवा पर वैदिक साहित्‍य के समर्थन से कई धर्मग्रंथ लिखे। भक्ति सेवा एक भावुक गतिविधि नहीं है। वैदिक ज्ञान का सार भक्ति सेवा है, जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की गई है: वेदिश्‍च सर्वैर अहम एव वेदयः। सभी वैदिक साहित्‍य का उद्देश्‍य कृष्‍ण को समझना है, और भक्ति सेवा के माध्‍यम से कृष्‍ण को कैसे समझा जाए यह श्रील रूप और सनातन गोस्‍वामी ने सभी वैदिक साहित्‍य के प्रमाण के साथ समझाया है। उन्‍होंने इसे इतनी अच्‍छी तरह से रखा है कि गोस्‍वामी के मार्गदर्शन में भक्ति सेवा से एक बदमाश या प्रथम श्रेणी के मूर्ख को भी मुक्ति मिल सकती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)