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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 271
 
 
श्लोक  2.1.271 
औद्धत्य करते हैल सबाकार मन ।
स्वतन्त्र हइया सबे नाशा’बे भुवन ॥271॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी भक्तों को फटकार लगाते हुए कहा कि वे धृष्टता न करें तथा स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण जगत को बिगाड़ें नहीं।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu rebuked everyone saying that you people should not show your audacity by becoming independent and should not destroy the whole world like this.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने अनुयायियों को स्वतंत्र या उद्दंड न बनने की चेतावनी दी थी। दुर्भाग्यवश, भगवान चैतन्य महाप्रभु के चले जाने के बाद, कई अप-सम्प्रदायों (तथाकथित अनुयायियों) ने आचार्यों द्वारा अनुमोदित न किए गए कई तरीके ईजाद किए। भक्ति विनोद ठाकुर ने उन्हें औला, बाउल, कर्ताभज, नेडा, दारवेश, साँई, सहजिया, सखीभेकी, स्मार्त, जाता-गोस्वामी, अतिवादी, चूडाधारी और गौरांग-नागरी बताया है।

औला-सम्प्रदाय, बाउल-सम्प्रदाय और अन्य लोगों ने आचार्यों के पदचिन्हों का अनुसरण किए बिना भगवान चैतन्य के दर्शन को समझने के अपने तरीके ईजाद किए। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं यहाँ संकेत देते हैं कि इस तरह के सभी प्रयासों से उनके पंथ की भावना ही खराब होगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)