औला-सम्प्रदाय, बाउल-सम्प्रदाय और अन्य लोगों ने आचार्यों के पदचिन्हों का अनुसरण किए बिना भगवान चैतन्य के दर्शन को समझने के अपने तरीके ईजाद किए। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं यहाँ संकेत देते हैं कि इस तरह के सभी प्रयासों से उनके पंथ की भावना ही खराब होगी।
