| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ » श्लोक 270 |
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| | | | श्लोक 2.1.270  | शुनि’ भक्त - गणे कहे स - क्रोध वचने ।
कृष्ण - नाम - गुण छाड़ि, कि कर कीर्तने ॥270॥ | | | | | | | अनुवाद | | अपने दिव्य गुणों का कीर्तन पसन्द न करते हुए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें क्रोधित होकर डाँटा। उन्होंने पूछा, "यह कैसा कीर्तन है? क्या तुम भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन छोड़ रहे हो?" | | | | Sri Chaitanya Mahaprabhu did not like the chanting of his divine qualities. So he scolded them all as if he were angry. He asked, “What kind of chanting is this? Are you giving up chanting the holy name of the Lord?” | | ✨ ai-generated | | |
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