श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 251
 
 
श्लोक  2.1.251 
निरन्तर नृत्य - गीत कीर्तन - विलास ।
आचण्डाले प्रेम - भक्ति करिला प्रकाश ॥251॥
 
 
अनुवाद
जगन्नाथपुरी में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने निरंतर कीर्तन और नृत्य किया। इस प्रकार उन्होंने संकीर्तन की लीला का आनंद लिया। उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा, ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम, सभी पर, यहाँ तक कि सबसे निम्नतम व्यक्ति पर भी, प्रकट किया।
 
In Jagannatha Puri, Sri Chaitanya Mahaprabhu constantly engaged in kirtan and dance. Thus, he savored the bliss of sankirtan-lila (the pastimes of singing). He bestowed his causeless grace, or pure love for God, upon everyone, even the lowest of the low (chandalas).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)