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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 227
 
 
श्लोक  2.1.227 
प्राते च लि’ आइला प्रभु ‘कानाइर नाटशाला’ ।
देखिल सकल ताहाँ कृष्ण - चरित्र - लीला ॥227॥
 
 
अनुवाद
प्रातःकाल भगवान वहाँ से निकलकर कानई नाटशाला नामक स्थान पर गए। वहाँ उन्होंने भगवान कृष्ण की अनेक लीलाएँ देखीं।
 
In the morning, Mahaprabhu left and went to a place called Kanai Natashala. There, he witnessed many pastimes of Lord Krishna.
तात्पर्य
उन दिनों बंगाल में बहुत से स्थान कानाई नाटकशाला के नाम से जाने जाते थे जहां भगवान कृष्ण के लीला-चित्र रखे जाते थे. लोग वहाँ उन्हें देखने जाते थे. इसे कृष्ण-चरित्र-लीला कहते हैं. बंगाल में अब भी हरी-सभा नामक ऐसे अनेक स्थान हैं जो यह दर्शाते हैं कि वे स्थान हैं जहाँ स्थानीय लोग मिलकर हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करते हैं और भगवान कृष्ण की लीलाओं पर चर्चा करते हैं. कानाई शब्द का अर्थ है "भगवान कृष्ण" और नाटकशाला उस स्थान को दर्शाता है जहाँ लीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है. इस प्रकार वे स्थान जो आजकल हरी-सभा कहलाते हैं उन्हें पहले कानाई नाटकशाला के नाम से जाना जाता रहा होगा.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)