यार सङ्गे चले एइ लोक लक्ष - कोटि ।
वृन्दावन - यात्रार ए नहे परिपाटी ॥224॥
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अनुवाद
“प्रिय प्रभु, आप सैकड़ों-हजारों लोगों के साथ वृन्दावन जा रहे हैं और यह तीर्थयात्रा करने का उचित तरीका नहीं है।”
O Lord, you are going to Vrindavan taking lakhs of people with you, but this is not the proper way to perform a pilgrimage.”
तात्पर्य
कभी-कभी कारोबार के लिए पुरुषों की बड़ी-बड़ी भीड़ों को तीर्थस्थानों पर ले जाया जाता है, और उनसे धन इकट्ठा किया जाता है। यह बहुत लाभदायक व्यापार है, पर रूप और सनातन गोस्वामी ने भगवान चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में अपनी राय व्यक्त करते हुए इस प्रकार की भीड़भाड़ वाली तीर्थयात्राओं को disapproved किया। वास्तव में जब भगवान चैतन्य ने वृंदावन का दौरा किया, तो उन्होंने इसे अकेले ही दौरा किया और केवल अपने भक्तों के निवेदन पर एक नौकर को सेवादार के रूप में स्वीकार किया। वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए भक्तों की भीड़ के साथ उन्होंने कभी वृंदावन का दौरा नहीं किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥