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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 220
 
 
श्लोक  2.1.220 
सबार चरणे धरि, पड़े दुइ भाइ ।
सबे बले, - धन्य तुमि, पाइले गोसाञि ॥220॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार, रूप और सनातन, दोनों भाइयों ने तुरन्त इन वैष्णवों के चरणकमलों का स्पर्श किया, जिससे वे सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए दोनों भाइयों को बधाई दी।
 
Following Sri Chaitanya Mahaprabhu's instructions, the two brothers, Rupa and Sanatana, immediately touched the feet of these Vaishnavas. They were all extremely pleased and congratulated the two brothers on receiving Mahaprabhu's grace.
तात्पर्य
यह व्यवहार वैष्णवों की वास्तविक निशानी है। जब उन्होंने देखा कि रूप और सनातन को भगवान की दया प्राप्त करने का सौभाग्य मिला है, तो वे इतने प्रसन्न हुए कि सभी ने दोनों भाइयों को बधाई दी। वैष्णव की पोशाक में ईर्ष्यालु व्यक्ति भगवान की दया प्राप्त करने वाले दूसरे वैष्णव की सफलता देखकर बिल्कुल भी खुश नहीं होता है। दुर्भाग्य से, कलि के इस युग में वैष्णवों की पोशाक में बहुत से सांसारिक व्यक्ति हैं, और श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने उन्हें कलि के शिष्य के रूप में वर्णित किया है। वह कहते हैं, कलि-चेला। वह इंगित करते हैं कि एक और वैष्णव है, एक छद्म वैष्णव जिसकी नाक पर तिलक और गले में कंठी माला है। ऐसा छद्म वैष्णव धन और महिलाओं से जुड़ता है और सफल वैष्णवों से जलता है। वैष्णव होने के बावजूद, उसका एकमात्र व्यवसाय वैष्णव की पोशाक में पैसा कमाना है। इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि ऐसा छद्म वैष्णव बिल्कुल भी वैष्णव नहीं है, बल्कि कलि-युग का शिष्य है। कलि का शिष्य किसी उच्च न्यायालय के निर्णय से आचार्य नहीं बन सकता। सांसारिक वोटों का वैष्णव आचार्य का चुनाव करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। एक वैष्णव आचार्य स्वयंभू होता है, और उसके लिए किसी अदालती फैसले की कोई आवश्यकता नहीं होती है। एक झूठा आचार्य किसी वैष्णव को उच्च न्यायालय के निर्णय से पछाड़ने की कोशिश कर सकता है, लेकिन भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि वह कलि-युग का शिष्य ही है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)