दुइ जने प्रभुर कृपा देखि’ भक्त - गणे ।
‘हरि’ ‘हरि’ बले सबै आनन्दित - मने ॥218॥
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अनुवाद
जब सभी भक्तों ने दोनों भाइयों पर भगवान की कृपा देखी, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और भगवान का पवित्र नाम, “हरि! हरि!” जपने लगे।
When all the devotees saw the grace of Mahaprabhu on both the brothers, they became very happy and started chanting the name of God saying “Hari! Hari!”
तात्पर्य
श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, छांडिया वैष्णव सेवा निस्तार पेयछे केबा: बिना किसी वैष्णव की सेवा किए कोई मुक्ति नहीं पा सकता। आध्यात्मिक गुरु शिष्य को उसकी मुक्ति के लिए दीक्षा देते हैं, अगर शिष्य आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का पालन करता है और अन्य वैष्णवों को अपमान नहीं पहुँचाता, तो उसका मार्ग स्पष्ट है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ उपस्थित सभी वैष्णवों से दो भाइयों रूप और सनातन पर दया करने को कहा, जिन्हें अभी हाल ही में उनके द्वारा दीक्षा दी गई थी। जब एक वैष्णव देखता है कि दूसरे वैष्णव पर भगवान की कृपा है, तो वह बहुत खुश होता है। वैष्णव ईर्ष्यालु नहीं होते। अगर भगवान की कृपा से कोई वैष्णव पूरी दुनिया में भगवान के पवित्र नाम का वितरण करने के लिए सशक्त होता है, तो दूसरे वैष्णव बहुत खुश होते हैं - अगर वे सच्चे वैष्णव हैं तो। जो वैष्णव के सफल होने पर ईर्ष्या करता है, वह निश्चित रूप से स्वयं वैष्णव नहीं है, बल्कि एक साधारण, सांसारिक व्यक्ति है। ईर्ष्या और जलन सांसारिक लोगों द्वारा प्रकट की जाती है, न कि वैष्णवों द्वारा। भगवान के पवित्र नाम का प्रसार करने में सफल होने वाले दूसरे वैष्णव से वैष्णव को ईर्ष्या क्यों करनी चाहिए? एक वास्तविक वैष्णव दूसरे वैष्णव को स्वीकार करने में बहुत प्रसन्न होता है जो भगवान की कृपा प्रदान कर रहा है। भगवान की वेशभूषा में एक सांसारिक व्यक्ति का सम्मान नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। यह शास्त्र में निषेध किया गया है (उपेक्षा)। उपेक्षा शब्द का अर्थ उपेक्षा करना है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को उपेक्षित करना चाहिए। एक प्रचारक का कर्तव्य परमेश्वर व्यक्तित्व के प्रति प्रेम करना, वैष्णवों से मैत्री करना, निर्दोषों पर दया करना और ईर्ष्या या जलन करने वालों को अस्वीकार करना या उपेक्षित करना है। इस कृष्ण भावना आंदोलन में वैष्णवों के वेश में कई ईर्ष्यालु लोग हैं, और उन्हें पूरी तरह से उपेक्षित किया जाना चाहिए। वैष्णव की वेशभूषा में रहने वाले ईर्ष्यालु व्यक्ति की सेवा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, छांडिया वैष्णव सेवा निस्तार पेयछे केबा, तो वह एक वास्तविक वैष्णव की ओर इशारा कर रहे हैं, न कि वैष्णव की वेशभूषा में ईर्ष्यालु या जलन करने वाले व्यक्ति की ओर।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥