शंख-चक्राद्य-ऊर्ध्व-पुंड्र- धारणाद्य-आत्म-लक्षणम्
तन नाम-करणं चैव वैष्णवत्वं इहोच्यते
“दीक्षा के बाद शिष्य का नाम बदल दिया जाना चाहिए ताकि यह संकेत मिले कि वह भगवान विष्णु का सेवक है। शिष्य को भी तुरंत अपने शरीर को तिलक (ऊर्ध्व-पुंड्र) से अंकित करना शुरू कर देना चाहिए, खासकर अपने माथे पर। ये आध्यात्मिक चिह्न हैं, एक पूर्ण वैष्णव के लक्षण हैं।” यह पद्म पुराण, उत्तर-खंड का एक श्लोक है। सहजिया-सम्प्रदाय का सदस्य अपना नाम नहीं बदलता; इसलिए उन्हें गौड़ीय वैष्णव के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति दीक्षा के बाद अपना नाम नहीं बदलता है, तो यह समझना चाहिए कि वह शरीरगत जीवन धारणा में ही बना रहेगा।
