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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.1.208 
आजि हैते दुँहार नाम ‘रूप’ ‘सनातन’ ।
दैन्य छाड़, तोमार दैन्ये फाटे मोर मन ॥208॥
 
 
अनुवाद
"मेरी प्रिय शकरा मल्लिका, आज से तुम्हारे नाम बदलकर श्रील रूप और श्रील सनातन हो जाएँगे। अब कृपया अपनी विनम्रता त्याग दो, क्योंकि तुम्हें इतना विनम्र देखकर मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है।
 
"O Saker Mallik, from today onwards your names will be Srila Rupa and Srila Sanatana. Now give up your humility, for my heart is breaking at the sight of your poverty.
तात्पर्य
वास्तव में यह श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दाबीर खास और साकर मल्लिका की दीक्षा है। उन्होंने विनम्रता के साथ प्रभु से संपर्क किया और प्रभु ने उन्हें पुराने सेवकों के रूप में, शाश्वत सेवकों के रूप में स्वीकार किया और उन्होंने उनके नाम बदल दिए। इससे यह समझना है कि दीक्षा के बाद शिष्य का अपना नाम बदलना आवश्यक है।

शंख-चक्राद्य-ऊर्ध्व-पुंड्र- धारणाद्य-आत्म-लक्षणम्

तन नाम-करणं चैव वैष्णवत्वं इहोच्यते

“दीक्षा के बाद शिष्य का नाम बदल दिया जाना चाहिए ताकि यह संकेत मिले कि वह भगवान विष्णु का सेवक है। शिष्य को भी तुरंत अपने शरीर को तिलक (ऊर्ध्व-पुंड्र) से अंकित करना शुरू कर देना चाहिए, खासकर अपने माथे पर। ये आध्यात्मिक चिह्न हैं, एक पूर्ण वैष्णव के लक्षण हैं।” यह पद्म पुराण, उत्तर-खंड का एक श्लोक है। सहजिया-सम्प्रदाय का सदस्य अपना नाम नहीं बदलता; इसलिए उन्हें गौड़ीय वैष्णव के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति दीक्षा के बाद अपना नाम नहीं बदलता है, तो यह समझना चाहिए कि वह शरीरगत जीवन धारणा में ही बना रहेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)