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श्लोक 2.1.206  |
भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्त - नि:शेष - मनो - रथान्तरः ।
कदाहमैकान्तिक - नित्य - किङ्करः प्रहर्षयिष्यामि सनाथ - जीवितम् ॥206॥ |
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| अनुवाद |
| "निरंतर आपकी सेवा करने से मनुष्य सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूर्णतः शांत हो जाता है। मैं कब आपका स्थायी सनातन सेवक बनूँगा और ऐसे योग्य स्वामी को पाकर सदैव आनंदित रहूँगा?" |
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| "By serving you constantly, one becomes free from all material desires and attains complete peace. When will the time come when I will become your eternal servant and feel eternally happy to have such a worthy master?" |
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