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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 206
 
 
श्लोक  2.1.206 
भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्त - नि:शेष - मनो - रथान्तरः ।
कदाहमैकान्तिक - नित्य - किङ्करः प्रहर्षयिष्यामि सनाथ - जीवितम् ॥206॥
 
 
अनुवाद
"निरंतर आपकी सेवा करने से मनुष्य सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूर्णतः शांत हो जाता है। मैं कब आपका स्थायी सनातन सेवक बनूँगा और ऐसे योग्य स्वामी को पाकर सदैव आनंदित रहूँगा?"
 
"By serving you constantly, one becomes free from all material desires and attains complete peace. When will the time come when I will become your eternal servant and feel eternally happy to have such a worthy master?"
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को उपदेश देते हुए प्रत्येक जीव को भगवान का शाश्वत सेवक घोषित किया है। यही सभी जीवों की वास्तविक स्थिति है। जैसे एक कुत्ता या सेवक एक पूर्ण और योग्य मालिक पाकर बहुत प्रसन्न होता है, या जिस तरह एक बच्चा अपने पिता को पाकर पूर्णत: संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह एक जीव भगवान का पूर्णत: सेवा भाव में लीन होकर ही संतुष्ट होता है। इस तरह वह जानता है कि उसके पास ऐसा पूर्ण स्वामी है जो उसे सभी प्रकार के संकटों से बचाएगा। जब तक जीव भगवान की गारंटीशुदा रक्षा में नहीं आ जाता, वह चिंता से भरा रहता है। चिंता का यह जीवन भौतिक अस्तित्व कहलाता है। पूर्णत: संतुष्ट और चिंतामुक्त होने के लिए, व्यक्ति को भगवान की शाश्वत सेवा करने की स्थिति में आना चाहिए। यह श्लोक श्री यमुनाचार्य द्वारा स्टोत्र-रत्न (43) से भी लिया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)