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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 198
 
 
श्लोक  2.1.198 
मोर कर्म, मोर हाते - गलाय बान्धिया ।
कु - विषय - विष्ठा - गर्ते दियाछे फेलाइया ॥198॥
 
 
अनुवाद
दोनों भाइयों, सकारा मल्लिका और दबीरा खासा ने बहुत विनम्रता से कहा कि उनके घृणित कार्यों के कारण अब उन्हें गर्दन और हाथों से बांध दिया गया है और उन्हें भौतिक इंद्रिय भोग की घृणित, मल जैसी वस्तुओं से भरी खाई में फेंक दिया गया है।
 
Both brothers, Saker Mallick and Dabir Khas, humbly pleaded that as a result of their heinous acts, they were bound by their hands and necks and thrown into a pit of disgusting sewage in the form of material sensual pleasures.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कु-विषय गर्त की व्याख्या इस प्रकार की है: “इंद्रियों की गतिविधियों के कारण, हम कई इंद्रिय तृप्ति कारक प्रक्रियाओं के अधीन हो जाते हैं और इस तरह भौतिक प्रकृति के नियमों में उलझे रहते हैं। इस उलझाव को विषय कहते हैं। जब इंद्रिय तृप्ति कारक प्रक्रियाओं को पवित्र गतिविधि द्वारा निष्पादित किया जाता है, तो उन्हें सु-विषय कहा जाता है। सु शब्द का अर्थ है 'अच्छा' और विषय का अर्थ है 'इंद्रिय की वस्तुएँ'। जब इंद्रिय तृप्ति कारक गतिविधियाँ पापपूर्ण परिस्थितियों में की जाती हैं, तो उन्हें कु-विषय, बुरी इंद्रिय भोग कहा जाता है। किसी भी मामले में, चाहे कु-विषय हो या सु-विषय, ये भौतिक गतिविधियाँ हैं। जैसे, इनकी तुलना मल से की जाती है। दूसरे शब्दों में, ऐसी चीजों से बचना चाहिए। सु-विषय और कु-विषय से मुक्त होने के लिए, अपने आप को भगवान कृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की प्रेममयी सेवा में संलग्न करना चाहिए। भक्ति सेवा की गतिविधियाँ भौतिक गुणों के संदूषण से मुक्त होती हैं। इसलिए, सु-विषय और कु-विषय की प्रतिक्रियाओं से मुक्त होने के लिए, व्यक्ति को कृष्ण चेतना में आना होगा। इस तरह से, व्यक्ति अपने आप को संदूषण से बचाएगा।" इस संबंध में, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने गाया है:

कर्म-कांड, ज्ञान-कांड, केवल विषेर भंड

अमृत बलिआ येब खाया

नाना योनि सदा फिरे, कदार्य भक्षण करे

तार जन्म अधः-पते याया

सु-विषय और कु-विषय दोनों कर्म-कांड की श्रेणी में आते हैं। एक और कांड (गतिविधि का मंच) है, जिसे ज्ञान-कांड कहा जाता है या भौतिक उलझाव से मुक्ति के साधनों को खोजने की मंशा से कु-विषय और सु-विषय के प्रभावों के बारे में दार्शनिक अटकलें। ज्ञान-कांड की मंच पर व्यक्ति कु-विषय और सु-विषय की वस्तुओं को छोड़ सकता है। लेकिन यही जीवन की पूर्णता नहीं है। पूर्णता ज्ञान-कांड और कर्म-कांड दोनों के लिए पारलौकिक है; यह भक्ति सेवा के मंच पर है। यदि हम कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा नहीं लेते हैं, तो हमें इस भौतिक दुनिया में बने रहना होगा और ज्ञान-कांड और कर्म-कांड के प्रभावों के कारण जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को सहना होगा। इसलिए नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:

नाना योनि सदा फिरे, कदार्य भक्षण करे

तार जन्म अधः-पते याया

"व्यक्ति जीवन की विभिन्न प्रजातियों में भटकता है और हर तरह की बकवास खाता है। इस तरह वह अपने अस्तित्व को बिगाड़ता है।" भौतिक अस्तित्व में रहने वाला और कु-विषय या सु-विषय से जुड़ा व्यक्ति मल में कीड़े के समान स्थिति में होता है। आखिरकार, चाहे वह नम हो या सूखा, मल मल होता है। इसी तरह, भौतिक गतिविधियाँ पवित्र या अपवित्र हो सकती हैं, लेकिन क्योंकि वे सभी भौतिक हैं, उनकी तुलना मल से की जाती है। कीड़े अपने प्रयास से मल से बाहर नहीं निकल सकते; इसी तरह, जो लोग भौतिक अस्तित्व से अत्यधिक जुड़े हुए हैं, वे भौतिकवाद से बाहर नहीं निकल सकते हैं और अचानक कृष्ण चेतनशील बन सकते हैं। सबका लगाव होता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (7.5.30) में प्रह्लाद महाराज ने समझाया है:

मतिर न कृष्णे परतः स्वतो वा

मित्रोऽभिपद्येत गृह-व्रतानां

अदांत-गोभिर विषतं तमिस्रं

पुनः-पुनश्-चर्वित-चर्वणानां

"जो लोग इस भौतिक दुनिया में बने रहने और इंद्रिय तृप्ति का आनंद लेने का मन बना चुके हैं, वे कृष्ण चेतनशील नहीं हो सकते। भौतिक गतिविधि के प्रति उनके लगाव के कारण, वे मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, चाहे श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्देशों से या अपने स्वयं के प्रयास से या बड़े सम्मेलनों में प्रस्ताव पारित करके। क्योंकि उनकी इंद्रियाँ अनियंत्रित होती हैं, वे धीरे-धीरे भौतिक अस्तित्व के सबसे अंधेरे क्षेत्रों में उतरते हैं ताकि जीवन की वांछनीय या अवांछनीय प्रजातियों में जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया को दोहराया जा सके।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)