कर्म-कांड, ज्ञान-कांड, केवल विषेर भंड
अमृत बलिआ येब खाया
नाना योनि सदा फिरे, कदार्य भक्षण करे
तार जन्म अधः-पते याया
सु-विषय और कु-विषय दोनों कर्म-कांड की श्रेणी में आते हैं। एक और कांड (गतिविधि का मंच) है, जिसे ज्ञान-कांड कहा जाता है या भौतिक उलझाव से मुक्ति के साधनों को खोजने की मंशा से कु-विषय और सु-विषय के प्रभावों के बारे में दार्शनिक अटकलें। ज्ञान-कांड की मंच पर व्यक्ति कु-विषय और सु-विषय की वस्तुओं को छोड़ सकता है। लेकिन यही जीवन की पूर्णता नहीं है। पूर्णता ज्ञान-कांड और कर्म-कांड दोनों के लिए पारलौकिक है; यह भक्ति सेवा के मंच पर है। यदि हम कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा नहीं लेते हैं, तो हमें इस भौतिक दुनिया में बने रहना होगा और ज्ञान-कांड और कर्म-कांड के प्रभावों के कारण जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को सहना होगा। इसलिए नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:
नाना योनि सदा फिरे, कदार्य भक्षण करे
तार जन्म अधः-पते याया
"व्यक्ति जीवन की विभिन्न प्रजातियों में भटकता है और हर तरह की बकवास खाता है। इस तरह वह अपने अस्तित्व को बिगाड़ता है।" भौतिक अस्तित्व में रहने वाला और कु-विषय या सु-विषय से जुड़ा व्यक्ति मल में कीड़े के समान स्थिति में होता है। आखिरकार, चाहे वह नम हो या सूखा, मल मल होता है। इसी तरह, भौतिक गतिविधियाँ पवित्र या अपवित्र हो सकती हैं, लेकिन क्योंकि वे सभी भौतिक हैं, उनकी तुलना मल से की जाती है। कीड़े अपने प्रयास से मल से बाहर नहीं निकल सकते; इसी तरह, जो लोग भौतिक अस्तित्व से अत्यधिक जुड़े हुए हैं, वे भौतिकवाद से बाहर नहीं निकल सकते हैं और अचानक कृष्ण चेतनशील बन सकते हैं। सबका लगाव होता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (7.5.30) में प्रह्लाद महाराज ने समझाया है:
मतिर न कृष्णे परतः स्वतो वा
मित्रोऽभिपद्येत गृह-व्रतानां
अदांत-गोभिर विषतं तमिस्रं
पुनः-पुनश्-चर्वित-चर्वणानां
"जो लोग इस भौतिक दुनिया में बने रहने और इंद्रिय तृप्ति का आनंद लेने का मन बना चुके हैं, वे कृष्ण चेतनशील नहीं हो सकते। भौतिक गतिविधि के प्रति उनके लगाव के कारण, वे मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, चाहे श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्देशों से या अपने स्वयं के प्रयास से या बड़े सम्मेलनों में प्रस्ताव पारित करके। क्योंकि उनकी इंद्रियाँ अनियंत्रित होती हैं, वे धीरे-धीरे भौतिक अस्तित्व के सबसे अंधेरे क्षेत्रों में उतरते हैं ताकि जीवन की वांछनीय या अवांछनीय प्रजातियों में जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया को दोहराया जा सके।"
