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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  2.1.197 
म्लेच्छ - जाति, म्लेच्छ - सेवी, करि म्लेच्छ - कर्म ।
गो - ब्राह्मण - द्रोहि - सङ्गे आमार सङ्गम ॥197॥
 
 
अनुवाद
"दरअसल हम मांसाहारी जाति के हैं क्योंकि हम मांसाहारियों के सेवक हैं। दरअसल, हमारे कर्म बिल्कुल मांसाहारियों जैसे ही हैं। चूँकि हम हमेशा ऐसे लोगों की संगति करते हैं, इसलिए हम गायों और ब्राह्मणों के प्रति द्वेष रखते हैं।"
 
"In reality, we belong to the mleccha (meat-eating) caste, because we are servants of the mlecchas. Indeed, our actions are exactly like those of the mlecchas. Since we always associate with such people, we are hostile towards cows and brahmins."
तात्पर्य
मांसाहारी दो प्रकार के होते हैं - एक वे जो मांसाहारी परिवार में जन्म लेते हैं और दूसरे वो जो मांसाहारियों के साथ संपर्क बनाने वाले होते हैं। श्रील रूप और सनातन गोस्वामी (पूर्व में दबीर खासा और सकार मल्लिका) से हम सीख सकते हैं कि कोई केवल मांसाहारियों से संपर्क करके मांसाहारी के चरित्र को कैसे धारण कर सकता है। भारत में इस समय राष्ट्रपति कार्यालयों पर कई तथाकथित ब्राह्मणों का कब्जा है, लेकिन राज्य गायों को मारने के लिए बूचड़खाने बनाए रखता है और वैदिक सभ्यता के खिलाफ प्रचार करता है। वैदिक सभ्यता का पहला सिद्धांत मांसाहार और नशा त्यागना है। वर्तमान में भारत में, नशा और मांसाहार को प्रोत्साहित किया जाता है, और इस राज्य के मामलों की अध्यक्षता करने वाले तथाकथित विद्वान ब्राह्मण निश्चित रूप से श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी द्वारा दिए गए मानक के अनुसार नीच हो गए हैं। ये तथाकथित ब्राह्मण मोटे वेतन के लिए बूचड़खानों को मंजूरी देते हैं, और वे इन घृणित गतिविधियों का विरोध नहीं करते हैं। वैदिक सभ्यता के सिद्धांतों को खारिज करके और गौ-हत्या का समर्थन करके, वे तुरंत ही म्लेच्छ और यवन के स्तर पर गिर जाते हैं। म्लेच्छ मांसाहारी होता है, और यवन वह होता है जो वैदिक संस्कृति से विचलित हो गया है। दुर्भाग्य से, ऐसे म्लेच्छ और यवन कार्यकारी शक्ति में हैं। फिर राज्य में शांति और समृद्धि कैसे हो सकती है? राजा या राष्ट्रपति सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान् के प्रतिनिधि होने चाहिए। जब महाराज युधिष्ठिर ने भारत-वर्ष (पूर्व में इस पूरे ग्रह, जिसमें सभी समुद्र और भूमि शामिल है) का शासन स्वीकार किया, तो उन्होंने भीष्मदेव और भगवान कृष्ण जैसे अधिकारियों से स्वीकृति ली। उन्होंने इस प्रकार धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार पूरी दुनिया पर शासन किया। हालाँकि, इस समय राज्य के प्रमुख धार्मिक सिद्धांतों की परवाह नहीं करते हैं। यदि धर्मविरोधी लोग किसी मुद्दे पर वोट देते हैं, भले ही वो शास्त्रों के सिद्धांतों के खिलाफ क्यों न हो, फिर भी बिल पास हो जाएंगे। राष्ट्रपति और राज्य के प्रमुख ऐसी घृणित गतिविधियों से सहमत होकर पापी हो जाते हैं। सनातन और रूप गोस्वामी ने ऐसी गतिविधियों के लिए दोषी माना; इसलिए उन्होंने खुद को म्लेच्छों में वर्गीकृत किया, हालाँकि उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)