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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.1.181 
एत क हि’ राजा गेला निज अभ्यन्तरे ।
तबे दबिर खास आइला आपनार घरे ॥181॥
 
 
अनुवाद
रूप गोस्वामी से यह वार्तालाप करने के बाद, राजा अपने निजी भवन में चले गए। रूप गोस्वामी, जिन्हें उस समय दबीरा खासा के नाम से जाना जाता था, भी अपने निवास पर लौट आए।
 
After this conversation with Rupa Goswami, the king went to his inner chambers. Rupa Goswami (who was then known as Dabir Khas) also returned to his home.
तात्पर्य
हिंदी-आख्यान: एक राजा निश्चित रूप से परम पुरुषोत्तम भगवान का प्रतिनिधि होता है। जैसे कि भगवद् गीता में लिखा है, सर्व-लोक-महेश्वरम: परम पुरुषोत्तम भगवान सभी ग्रह प्रणालियों के स्वामी हैं। प्रत्येक ग्रह पर एक राजा, शासकीय प्रमुख या कार्यपालक होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति भगवान विष्णु के प्रतिनिधि माने जाते हैं। परम पुरुषोत्तम भगवान की ओर से, उसे सभी लोगों के हितों को देखना चाहिए। इसलिए भगवान विष्णु, परमात्मा के रूप में, राजा को शासकीय कार्यों को निष्पादित करने के लिए सारी बुद्धि देते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने इसलिए राजा से पूछा कि श्री चैतन्य महाप्रभु के बारे में उसके मन में क्या था और उन्होंने संकेत किया कि राजा उनके बारे में जो कुछ भी सोचता है वह सही है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)