एक शुद्ध भक्त के लिए यही समान है कि वह भौतिक रूप से मार्ग का निर्माण करे या अपने मन में निर्माण करे। इसका कारण यह है कि ईश्वर का परम व्यक्तित्व, जनार्दन, भाव-ग्राही या भावना की सराहना करने वाला होता है। उनके लिए वास्तविक आभूषणों से बना हुआ मार्ग और मानसिक आभूषणों से बना हुआ मार्ग समान होता है। यद्यपि सूक्ष्म, मन भी पदार्थ है, इसलिए कोई भी मार्ग - वास्तव में, प्रभु की सेवा के लिए कुछ भी, चाहे वह सकल पदार्थ में हो या सूक्ष्म पदार्थ में - ईश्वर का परम व्यक्तित्व समान रूप से स्वीकार करता है। प्रभु अपने भक्त के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं और देखते हैं कि वह उनकी कितनी सेवा करने के लिए तैयार है। भक्त स्वतंत्र है कि वह प्रभु की सेवा या तो सकल पदार्थ में या सूक्ष्म पदार्थ में करे। महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा ईश्वर के परम व्यक्तित्व के संबंध में हो। यह भगवद-गीता (9.26) में पुष्टि की गई है:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपाहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः
"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या पानी प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।" वास्तविक घटक भक्ति (भक्ति) है। शुद्ध भक्ति भौतिक प्रकृति के गुणों से अछूती होती है। अहैतुकी अप्रतिहता: बिना शर्त भक्ति सेवा को किसी भौतिक स्थिति से रोका नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह है कि ईश्वर के परम व्यक्तित्व की सेवा करने के लिए बहुत अमीर होने की जरूरत नहीं है। अगर उसके पास शुद्ध भक्ति है तो सबसे गरीब आदमी भी ईश्वर के परम व्यक्तित्व की समान रूप से सेवा कर सकता है। अगर कोई गुप्त इरादा नहीं है, तो भक्ति सेवा को किसी भौतिक स्थिति से नहीं रोका जा सकता है।
