Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  2.1.161 
निश्चय करिया कहि, शुन, भक्त - गण ।
एबार ना याबेन प्रभु श्री - वृन्दावन ॥161॥
 
 
अनुवाद
तब उन्होंने बड़े आश्वासन के साथ भक्तों को बताया कि भगवान चैतन्य उस समय वृन्दावन नहीं जायेंगे।
 
After that he confidently told the devotees that this time Sri Chaitanya Mahaprabhu would not go to Vrindavan.
तात्पर्य
श्रील नृसिंहानंद ब्रह्मचारी भगवान चैतन्य महाप्रभु के महान भक्त थे; इसलिए जब उन्हें पता चला कि कुल्या से श्री चैतन्य महाप्रभु वृंदावन जा रहे हैं, तो यद्यपि उनके पास कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं थी, उन्होंने अपने मन में चैतन्य महाप्रभु के लिए बहुत आकर्षक मार्ग या सड़क का निर्माण करना शुरू कर दिया। इस रास्ते का कुछ वर्णन ऊपर दिया गया है। परन्तु वह मानसिक रूप से भी कानाई नाटशाला से आगे मार्ग का निर्माण नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि चैतन्य महाप्रभु उस समय वृंदावन नहीं जाएँगे।

एक शुद्ध भक्त के लिए यही समान है कि वह भौतिक रूप से मार्ग का निर्माण करे या अपने मन में निर्माण करे। इसका कारण यह है कि ईश्वर का परम व्यक्तित्व, जनार्दन, भाव-ग्राही या भावना की सराहना करने वाला होता है। उनके लिए वास्तविक आभूषणों से बना हुआ मार्ग और मानसिक आभूषणों से बना हुआ मार्ग समान होता है। यद्यपि सूक्ष्म, मन भी पदार्थ है, इसलिए कोई भी मार्ग - वास्तव में, प्रभु की सेवा के लिए कुछ भी, चाहे वह सकल पदार्थ में हो या सूक्ष्म पदार्थ में - ईश्वर का परम व्यक्तित्व समान रूप से स्वीकार करता है। प्रभु अपने भक्त के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं और देखते हैं कि वह उनकी कितनी सेवा करने के लिए तैयार है। भक्त स्वतंत्र है कि वह प्रभु की सेवा या तो सकल पदार्थ में या सूक्ष्म पदार्थ में करे। महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा ईश्वर के परम व्यक्तित्व के संबंध में हो। यह भगवद-गीता (9.26) में पुष्टि की गई है:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

तदहं भक्त्युपाहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः

"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या पानी प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।" वास्तविक घटक भक्ति (भक्ति) है। शुद्ध भक्ति भौतिक प्रकृति के गुणों से अछूती होती है। अहैतुकी अप्रतिहता: बिना शर्त भक्ति सेवा को किसी भौतिक स्थिति से रोका नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह है कि ईश्वर के परम व्यक्तित्व की सेवा करने के लिए बहुत अमीर होने की जरूरत नहीं है। अगर उसके पास शुद्ध भक्ति है तो सबसे गरीब आदमी भी ईश्वर के परम व्यक्तित्व की समान रूप से सेवा कर सकता है। अगर कोई गुप्त इरादा नहीं है, तो भक्ति सेवा को किसी भौतिक स्थिति से नहीं रोका जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)