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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  2.1.126 
सबे मिलि ‘युक्ति करि’ कीर्तन आरम्भिल ।
कीर्तन - आवेशे प्रभुर मन स्थिर हैल ॥126॥
 
 
अनुवाद
उचित विचार-विमर्श के बाद, सभी भक्तों ने सामूहिक रूप से पवित्र नाम का जप शुरू कर दिया। इस प्रकार जप के आनंद से भगवान चैतन्य का मन शांत हो गया।
 
After mutual discussion, all the devotees began a group kirtan. Thus, Sri Chaitanya Mahaprabhu's mind was calmed by the joy of kirtan.
तात्पर्य
सर्व परिस्थिति में संपूर्ण होने के नाते, भगवान जगन्नाथ का व्यक्तित्व, रूप, चित्र और कीर्तन सभी एक समान हैं। इसलिए जब चैतन्य महाप्रभु ने भगवान के पवित्र नाम का जप सुना, तो वे शांत हो गए। इससे पहले, जगन्नाथ से अलग होने के कारण वे बहुत उदासीन महसूस कर रहे थे। निष्कर्ष यह है कि जब भी शुद्ध भक्तों का कीर्तन होता है, तो प्रभु तुरंत उपस्थित हो जाते हैं। भगवान के पवित्र नामों का जप करके, हम भगवान से व्यक्तिगत रूप से जुड़ते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)