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अध्याय 1: श्री चैतन्य महाप्रभु की परवर्ती लीलाएँ
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श्लोक 121
श्लोक
2.1.121
पुनरपि नीलाचले गमन करिल ।
भक्त - गणे मेलिया स्नान - यात्रा देखिल ॥121॥
अनुवाद
इन पुस्तकों को एकत्रित करके श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आए। उस समय जगन्नाथ का स्नान-समारोह हो रहा था, और उन्होंने उसे देखा।
Sri Chaitanya Mahaprabhu returned to Jagannath Puri with these books. He witnessed the Jagannath bathing festival being celebrated at that time.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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