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श्लोक 2.1.107  |
श्री - रङ्ग - क्षेत्र आइला कावेरीर तीर ।
श्री - रङ्ग देखिया प्रेमे हइला अस्थिर ॥107॥ |
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| अनुवाद |
| जब श्री चैतन्य महाप्रभु कावेरी नदी के तट पर श्री रंगक्षेत्र की भूमि पर आये, तो उन्होंने श्री रंगनाथ के मंदिर का दौरा किया और वहाँ भगवान के प्रेम के आनंद में डूब गये। |
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| When Sri Chaitanya Mahaprabhu came to Sriranga Kshetra situated on the banks of Kaveri, he visited the Sri Ranganatha Temple and there he became overwhelmed with the joy of love for God. |
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