हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करते हुए, श्री चैतन्य महाप्रभु कभी-कभी बेहोश हो जाते थे और कई घंटों तक बेसुध रहते थे। वे अपने शिछाष्टक (7) में प्रार्थना करते हैं:
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितं
शून्ययितं जगत् सर्वं गोविंद-विरहेण मे
"हे गोविंद! आपके वियोग को महसूस करते हुए, मैं एक पल को बारह वर्ष या उससे अधिक मान रहा हूं। मेरी आंखों से बारिश की धारों की तरह आंसू बह रहे हैं, और आपकी अनुपस्थिति में मुझे दुनिया में सब कुछ खाली लग रहा है।" श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दर्शाए गए हरे कृष्ण मंत्र के जाप और ईश्वर के प्रेम का फल प्राप्त करने का यह पूर्णता का चरण है। व्यक्ति को कृत्रिम रूप से इस अवस्था की नकल नहीं करनी चाहिए, लेकिन अगर कोई गंभीर है और ईमानदारी से नियमनकारी सिद्धांतों का पालन करता है और हरे कृष्ण मंत्र का जाप करता है, तो समय आएगा जब ये लक्षण दिखाई देंगे। उसकी आँखों में आँसू भर जाएँगे, वह महामंत्र का स्पष्ट रूप से उच्चारण नहीं कर पाएगा और हर्षोल्लास में उसका हृदय धड़केगा। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि व्यक्ति को इसकी नकल नहीं करनी चाहिए, लेकिन एक भक्त को उस दिन के लिए तरसना चाहिए जब ऐसी समाधि के लक्षण स्वतः उसके शरीर में प्रकट हों।
