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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.9.43 
प्राणिनामुपकाराय यदेवेह परत्र च ।
कर्मणा मनसा वाचा तदेव मति - मान्भजेत् ॥43॥
 
 
अनुवाद
“‘बुद्धिमान व्यक्ति को अपने कार्य, विचारों और शब्दों से ऐसे कार्य करने चाहिए जो इस जीवन और अगले जीवन में सभी जीवों के लिए लाभदायक हों।’
 
“A wise man should do such deeds through his actions, thoughts and words that will be beneficial for all living beings in this life and the next.”
तात्पर्य
दुर्भाग्य से, लोग सामान्य रूप से यह नहीं जानते कि अगले जीवन में क्या होगा। स्वयं को अपने अगले जीवन के लिए तैयार करना सामान्य समझदारी है, और यह वैदिक सभ्यता का एक सिद्धांत है, लेकिन वर्तमान में दुनिया भर के लोग अगले जीवन पर विश्वास नहीं करते हैं। यहाँ तक कि प्रभावशाली प्रोफेसर और अन्य शिक्षक भी कहते हैं कि जैसे ही शरीर समाप्त हो जाता है, सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह नास्तिक दर्शन मानव सभ्यता को मार रहा है। लोग गैर जिम्मेदाराना ढंग से सभी तरह की पापपूर्ण गतिविधियों का प्रदर्शन कर रहे हैं, और इस तरह से अनाम नेताओं के शैक्षिक प्रचार द्वारा मानव जीवन का विशेषाधिकार छीन लिया जा रहा है। वास्तव में यह एक तथ्य है कि यह जीवन अगले जीवन की तैयारी के लिए है; विकास द्वारा व्यक्ति कई प्रजातियों या रूपों से आया है, और जीवन का यह मानव रूप स्वयं को बेहतर जीवन में बढ़ावा देने का एक अवसर है। इसे भगवद-गीता (9.25) में समझाया गया है:

यांति देव-व्रता देवान्पितॄन् यांति पितृ-व्रताः

भूतानि यांति भूतेज्यायांति मद-याजिनो ऽपि मां

"जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे; जो भूत और आत्माओं की पूजा करते हैं वे ऐसे प्राणियों के बीच जन्म लेंगे; जो पूर्वजों की पूजा करते हैं वे पूर्वजों के पास जाते हैं; और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ रहेंगे।" इसलिए, व्यक्ति स्वयं को उच्च ग्रह प्रणालियों में बढ़ावा दे सकता है, जो देवताओं का निवास है, व्यक्ति स्वयं को पितृलोका में बढ़ावा दे सकता है, व्यक्ति पृथ्वी पर रह सकता है, या व्यक्ति गृह वापस, भगवान के पास भी जा सकता है। इस बात की और पुष्टि भगवद-गीता (4.9) में की गई है: त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति माम एति सः अर्जुन। शरीर को त्यागने के बाद, जो कृष्ण को सत्य में जानता है वह फिर से इस दुनिया में वापस नहीं आता है कि एक भौतिक शरीर को स्वीकार करे, लेकिन वह घर वापस चला जाता है, भगवान के पास। यह ज्ञान शास्त्रों में है, और लोगों को इसे समझने का अवसर दिया जाना चाहिए। भले ही कोई एक जीवन में भगवान के पास वापस जाने में सक्षम नहीं है, वैदिक सभ्यता कम से कम व्यक्ति को उच्च ग्रह प्रणालियों में प्रोत्साहित होने का अवसर देती है, जहाँ देवता रहते हैं, और पशु जीवन के लिए फिर से नीचे नहीं गिरते। वर्तमान में, लोग इस ज्ञान को नहीं समझते हैं, हालांकि यह एक महान विज्ञान का गठन करता है, क्योंकि वे अशिक्षित हैं और इसे स्वीकार न करने के लिए प्रशिक्षित हैं। यह आधुनिक मानव समाज की भयानक स्थिति है। इस प्रकार, कृष्ण चेतना आंदोलन जीवन में अधिक लाभ के लिए बुद्धिमान पुरुषों का ध्यान आकर्षित करने की एकमात्र आशा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)