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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.9.4 
श्री - रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ ।
श्री - जीव, गोपाल - भट्ट, दास - रघुनाथ ॥4॥
 
 
अनुवाद
मुझे छह गोस्वामी भी याद हैं - रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट और दास रघुनाथ।
 
I also remember the six Gosvamis – Rupa, Sanatana, Bhatta Raghunatha, Sri Jiva, Gopala Bhatta and Dasa Raghunatha.
तात्पर्य
वैष्णव साहित्य रचना की प्रक्रिया है। जिसके पास वैष्णव गुण नहीं होते वह भावुकतावादी श्रेष्ठ साहित्य की रचना नहीं कर सकता। ऐसे बहुत से मूर्ख हैं जो कृष्ण-लीला को कला का विषय समझते हैं और भगवान कृष्ण की गोपियों के साथ की लीलाओं के बारे में लिखते या चित्रकारी करते हैं, कई बार तो उन्हें अश्लील तरीके से प्रस्तुत करते हैं। इन मूर्खों को भौतिक इंद्रिय सुख में आनंद मिलता है, लेकिन जो लोग आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहते हैं उन्हें अपने साहित्य से परहेज करना चाहिए। जब तक कोई कृष्ण और वैष्णवों का सेवक न बने, जैसा कि कृष्णदास कविराज गोस्वामी खुद को भगवान चैतन्य, उनके सहयोगियों और उनके शिष्यों की वंदना करने के लिए प्रस्तुत करते हैं, किसी को भी श्रेष्ठ साहित्य लिखने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)