अतएव सब फल दे ह’ यारे तारे ।
खाइया हउक् लोक अजर अमरे ॥39॥
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अनुवाद
"इस कृष्णभावनामृत आंदोलन को पूरे विश्व में फैलाओ। लोग इन फलों को खाएँ और अंततः बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्त हो जाएँ।"
Spread this Krishna Consciousness movement throughout the world, so that all people can eat these fruits and ultimately become free from old age and death.
तात्पर्य
भगवान चैतन्य द्वारा शुरू किया गया कृष्ण चेतना आंदोलन इसलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि जो कोई भी इसे अपनाता है, वह जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे से मुक्त होकर अमर हो जाता है। लोग यह नहीं पहचान पाते कि जीवन में वास्तविक संकट जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के चार सिद्धांत हैं। वे इतने मूर्ख हैं कि वे स्वयं को इन चारों दुखों के लिए त्याग देते हैं, हरि कृष्ण महा-मंत्र के पारलौकिक उपाय को नहीं जानते हुए। मात्र हरि कृष्ण महा-मंत्र का जाप करने भर से, व्यक्ति सभी दुखों से मुक्त हो सकता है, लेकिन इसलिए कि वे भ्रमपूर्ण ऊर्जा से मुग्ध हैं, लोग इस आंदोलन को गंभीरता से नहीं लेते। इसलिए वे जो वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु के सेवक हैं उन्हें इस आंदोलन को पूरी दुनिया में गंभीरतापूर्वक वितरित करना चाहिए ताकि मानव समाज को सबसे बड़ा लाभ दिया जा सके। बेशक, जानवर और अन्य निम्न प्रजातियाँ इस आंदोलन को समझने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन अगर मनुष्यों की एक छोटी संख्या भी इसे गंभीरता से लेती है, तो उनके जोर से जप करने से, सभी जीवित संस्थाएं, जिसमें पेड़, जानवर और अन्य निम्न प्रजातियां भी शामिल हैं, को लाभ होगा। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर से पूछा कि उन्हें मनुष्यों के अलावा अन्य जीवित संस्थाओं को कैसे लाभ पहुंचाना है, श्रील हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया कि हरि कृष्ण महा-मंत्र इतना शक्तिशाली है कि अगर इसका जोर से जाप किया जाता है, तो सभी को लाभ होगा, जिसमें जीवन की निम्न प्रजातियां भी शामिल हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥