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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.9.38 
आत्म - इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि निरन्तर ।
ताहाते असङ्ख्य फल वृक्षेर उपर ॥38॥
 
 
अनुवाद
“भगवान की दिव्य इच्छा से, पूरे वृक्ष पर जल छिड़का गया है, और इस प्रकार भगवान के प्रेम के असंख्य फल हैं।
 
By the divine will of the Supreme Personality of Godhead, the entire tree has been sprinkled with water and thus innumerable fruits of love of the Lord have appeared.
तात्पर्य
भगवान असीमित हैं और उनकी इच्छाएँ भी असीमित हैं। असीमित फलों का यह उदाहरण भौतिक संदर्भ में भी तथ्यात्मक रूप से उपयुक्त है क्योंकि भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की इच्छा से पर्याप्त फल, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जा सकता है ताकि दुनिया के सभी लोग उन्हें खत्म न कर पाएँ, भले ही वे अपनी क्षमता से दस गुना अधिक खाएँ। इस भौतिक दुनिया में वास्तव में किसी भी चीज़ की कमी नहीं है सिवाय कृष्ण चेतना के। यदि लोग कृष्ण चेतन बन जाते हैं, तो भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की अलौकिक इच्छा से पर्याप्त खाद्य पदार्थों का उत्पादन होगा ताकि लोगों को कोई भी आर्थिक समस्या न हो। इस तथ्य को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। फलों और फूलों का उत्पादन हमारी इच्छा पर नहीं बल्कि भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की सर्वोच्च इच्छा पर निर्भर करता है। यदि वह प्रसन्न होते हैं, तो वह पर्याप्त फल, फूल आदि की आपूर्ति कर सकते हैं, लेकिन यदि लोग नास्तिक और ईश्वरविहीन हैं, तो प्रकृति, उनकी इच्छा से, भोजन की आपूर्ति को प्रतिबंधित करती है। उदाहरण के लिए, भारत के कई प्रांतों में, विशेष रूप से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य निकटवर्ती राज्यों में, कभी-कभी वर्षा की कमी के कारण खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो जाती है। तथाकथित वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते। इसलिए, सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए, व्यक्ति को कृष्ण चेतन बनकर और भक्ति सेवा में नियमित रूप से उनकी पूजा करके भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व की सद्भावना प्राप्त करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)