Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.9.32 
अलौकिक वृक्ष करे सर्वेन्द्रिय - कर्म ।
स्थावर हइया धरे जङ्गमेर धर्म ॥32॥
 
 
अनुवाद
"चूँकि भक्ति का वृक्ष दिव्य है, इसलिए इसका प्रत्येक भाग अन्य सभी भागों का कार्य कर सकता है। यद्यपि वृक्ष अचल माना जाता है, फिर भी यह वृक्ष गतिमान है।
 
Because the tree of devotion is divine, each of its parts can perform the functions of all the others. Although the tree is considered immobile, it is also mobile.
तात्पर्य
हमारे भौतिक अनुभव के अनुसार पेड़ एक ही जगह खड़े रहते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दुनिया में एक पेड़ एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है। इसीलिए आध्यात्मिक दुनिया में हर चीज़ को अलौकिक, असामान्य या दिव्य कहा जाता है। ऐसे पेड़ की एक और ख़ासियत यह है कि यह सार्वभौमिक रूप से काम कर सकता है। भौतिक दुनिया में एक पेड़ की जड़ें भोजन इकट्ठा करने के लिए पृथ्वी के अंदर गहराई तक जाती हैं, लेकिन आध्यात्मिक दुनिया में पेड़ के ऊपरी हिस्से की टहनियाँ, शाखाएँ और पत्तियाँ जड़ों की तरह काम कर सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)