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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 9: भक्ति का कल्पवृक्ष  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.9.10 
जय श्री माधवपुरी कृष्ण - प्रेम - पूर ।
भक्ति - कल्पतरुर तेंहो प्रथम अङ्कुर ॥10॥
 
 
अनुवाद
श्रीमाधवेन्द्र पुरी की जय हो, जो समस्त कृष्ण भक्ति के भण्डार हैं! वे भक्ति के कल्पवृक्ष हैं और उन्हीं में भक्ति का बीज सर्वप्रथम फलित हुआ।
 
All hail Sri Madhavendra Puri, the repository of Krishna devotion! He is the Kalpavriksha (wishful tree) of devotion, and it was in him that the first seed of devotion sprouted.
तात्पर्य
श्री माधवेंद्र पुरी, जिन्हें श्री माधवा पुरी के रूप में भी जाना जाता है, माधवाचार्य से संन्यास दीक्षा प्राप्त करने वाले परंपरा के थे और एक महान संन्यासी थे। श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री माधवेंद्र पुरी के तीसरे परंपरागत वंशज थे। माधवाचार्य की परंपरागत वंशावली में पूजा की प्रक्रिया केवल रस्मी कृत्यों से भरी हुई थी, जिसमें भगवान के प्रति प्रेम का कोई चिन्ह नहीं था। श्री माधवेंद्र पुरी अपने उस परंपरागत वंश में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भगवान के प्रति प्रेम के लक्षणों को प्रदर्शित किया था और "अयि दीना-दयाद्र नथ", "हे भगवान जो परम दयालु हैं" शब्दों से शुरू होने वाली एक कविता लिखने वाले पहले व्यक्ति थे। इस कविता में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा भगवान के प्रति प्रेम के विकास का बीज है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)