तेषां सतत-युक्तनां भजतां प्रीति-पूर्वकम
ददामी बुद्धि-योगं तं येन मामुपयांति ते
''जो लोग लगातार प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने के योग्य हैं, मैं उन्हें वह समझ प्रदान करता हूं जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।'' भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने का अवसर सभी के लिए खुला है क्योंकि प्रत्येक जीव प्राकृतिक रूप से भगवान का सेवक है। भगवान की सेवा में संलग्न होना जीव का प्राकृतिक कार्य है, लेकिन चूंकि वह माया, भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से ढका हुआ है, वह इसे एक बहुत ही कठिन कार्य मानता है। लेकिन अगर वह खुद को किसी आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में रखता है और सब कुछ ईमानदारी से करता है, तो तुरंत भगवान, जो सभी के हृदय में विराजमान है, बताते हैं कि उसकी सेवा कैसे करें (ददामी बुद्धि-योगं तम)। भगवान इस निर्देश को देते हैं, और इस तरह भक्त का जीवन परिपूर्ण हो जाता है। एक शुद्ध भक्त जो कुछ भी करता है, वह परम भगवान की अनुमति से किया जाता है। इस प्रकार श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक ने पुष्टि की है कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा वह श्री मदन-मोहन देवता के निर्देशन में लिखा गया था।
