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अनुवाद
वैष्णवों की आज्ञा पाकर, किन्तु हृदय में चिन्ताग्रस्त होकर, मैं वृन्दावन में मदनमोहन के मन्दिर में उनकी अनुमति लेने गया।
After receiving the permission of the Vaishnavas, but being worried in my mind, I went to the Madan Mohan Temple in Vrindavan to seek their permission as well.
तात्पर्य
नित्य वैष्णव गुरु और कृष्ण की आज्ञा का पालन करता है। श्री चैतन्य-चरितामृत कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उनकी दया से लिखा है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उल्लेखित सभी भक्तों को अपने दीक्षा गुरु या अध्यात्मिक गुरु माना, और मदन-गोपाल (श्री मदन-मोहन विग्रह) स्वयं कृष्ण हैं। इस प्रकार उन्होंने दोनों से अनुमति ली, और जब उन्हें गुरु और कृष्ण दोनों की कृपा प्राप्त हुई, तो वह इस महान साहित्य, श्री चैतन्य-चरितामृत को लिखने में सक्षम हुए। इस उदाहरण का अनुसरण किया जाना चाहिए। कोई भी जो कृष्ण के बारे में लिखने का प्रयास करता है, उसे पहले अध्यात्मिक गुरु और कृष्ण से अनुमति लेनी चाहिए। कृष्ण हर किसी के हृदय में स्थित हैं, और अध्यात्मिक गुरु उनके प्रत्यक्ष बाहरी प्रतिनिधि हैं। इस प्रकार कृष्ण अंतर-बहिः, भीतर और बाहर स्थित हैं। व्यक्ति को पहले सख्त नियमित सिद्धांतों का पालन करके और प्रतिदिन सोलह माला का जाप करके एक शुद्ध भक्त बनना चाहिए, और जब वह सोचता है कि वह वास्तव में वैष्णव मंच पर है, तो उसे अध्यात्मिक गुरु से अनुमति लेनी चाहिए, और उस अनुमति की पुष्टि कृष्ण द्वारा उनके हृदय से भी होनी चाहिए। फिर, यदि वह बहुत ईमानदार और शुद्ध है, तो वह गद्य या कविता में पारलौकिक साहित्य लिख सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥