श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.8.66 
काशीश्वर गोसाञि र शिष्य - गोविन्द गोसाञि ।
गोविन्देर प्रिय - सेवक ताँर सम नाञि ॥66॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन में भगवान गोविंद की सेवा में लगे पुजारी गोविंद गोसांई, काशीश्वर गोसांई के शिष्य थे। गोविंद विग्रह को उनसे अधिक प्रिय कोई सेवक नहीं था।
 
Govind Gosain, the priest engaged in the service of Lord Govind in Vrindavan, was a disciple of Kashiswar Gosain. No other devotee was more dear to the Deity of Govind than he.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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