Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.8.66 
काशीश्वर गोसाञि र शिष्य - गोविन्द गोसाञि ।
गोविन्देर प्रिय - सेवक ताँर सम नाञि ॥66॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन में भगवान गोविंद की सेवा में लगे पुजारी गोविंद गोसांई, काशीश्वर गोसांई के शिष्य थे। गोविंद विग्रह को उनसे अधिक प्रिय कोई सेवक नहीं था।
 
Govind Gosain, the priest engaged in the service of Lord Govind in Vrindavan, was a disciple of Kashiswar Gosain. No other devotee was more dear to the Deity of Govind than he.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अपने अनुभाष्य में लिखते हैं, "काशीश्वर गोसाँइ श्री चैतन्य महाप्रभु के समकालीनों में से एक थे जो जगतनाथ पुरी में भगवान के साथ थे। काशीश्वर पण्डित के नाम से भी जाने जाते थे, वे ईश्वर पुरी के शिष्य थे और वासुदेव भट्टाचार्य के पुत्र थे, जो काँजीलाल कानु के वंश से संबंधित थे। उनका उपनाम चौधरी था। उनके भतीजे, उनकी बहन के पुत्र, जिनका नाम रुद्र पण्डित था, वह वल्लभापुर के मूल पुजारी थे, जो श्रीरामपुर रेलवे स्टेशन से लगभग एक मील दूर चाटरा गांव में स्थित है। वहाँ राधा-गोविंद और भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के देवता स्थापित हैं। काशीश्वर गोसाँइ बहुत मजबूत व्यक्ति थे, और इसलिए जब भगवान चैतन्य जगन्नाथ के मंदिर में जाते थे, तो वह भगवान को भीड़ से बचाते थे। उनका एक और कर्तव्य कीर्तन के बाद भक्तों को प्रसाद वितरित करना था।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर वल्लभापुर के इस मंदिर में गए थे। उस समय प्रभारी व्यक्ति एक शैव, श्री शिवचंद्र चौधरी थे, जो काशीश्वर गोसाँइ के भाई के वंशज थे। वल्लभापुर में प्रतिदिन नौ किलो चावल, सब्जियाँ और अन्य खाद्य पदार्थ पकाने की स्थायी व्यवस्था थी, और गाँव के पास पर्याप्त भूमि थी, जो देवता की थी, जिस पर यह चावल उगाया जाता था। दुर्भाग्य से, काशीश्वर गोसाँइ के भाई के वंशजों ने इस भूमि के एक बड़े हिस्से को बेच दिया है, और इसलिए देवता की पूजा अब बाधित हो गई है।

गौर-गणोद्देश-दीपिका (137) में कहा गया है कि वृंदावन में कृष्ण के सेवक भृंगार भगवान चैतन्य महाप्रभु के समय में काशीश्वर गोसाँइ के रूप में अवतरित हुए थे। हमारे गृहस्थ जीवन में हम भी कभी-कभी वल्लभापुर के इस मंदिर में जाते थे और दोपहर में वहाँ प्रसाद ग्रहण करते थे। इस मंदिर के देवता, श्री श्री राधा-गोविंद और गौरांग विग्रह अत्यंत सुंदर हैं। वल्लभापुर के पास जगन्नाथ का एक सुंदर मंदिर है। हम कभी-कभी इस जगन्नाथ मंदिर में भी प्रसाद ग्रहण करते थे। ये दोनों मंदिर कलकत्ता के पास श्रीरामपुर रेलवे स्टेशन से एक मील के दायरे में स्थित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)