श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर वल्लभापुर के इस मंदिर में गए थे। उस समय प्रभारी व्यक्ति एक शैव, श्री शिवचंद्र चौधरी थे, जो काशीश्वर गोसाँइ के भाई के वंशज थे। वल्लभापुर में प्रतिदिन नौ किलो चावल, सब्जियाँ और अन्य खाद्य पदार्थ पकाने की स्थायी व्यवस्था थी, और गाँव के पास पर्याप्त भूमि थी, जो देवता की थी, जिस पर यह चावल उगाया जाता था। दुर्भाग्य से, काशीश्वर गोसाँइ के भाई के वंशजों ने इस भूमि के एक बड़े हिस्से को बेच दिया है, और इसलिए देवता की पूजा अब बाधित हो गई है।
गौर-गणोद्देश-दीपिका (137) में कहा गया है कि वृंदावन में कृष्ण के सेवक भृंगार भगवान चैतन्य महाप्रभु के समय में काशीश्वर गोसाँइ के रूप में अवतरित हुए थे। हमारे गृहस्थ जीवन में हम भी कभी-कभी वल्लभापुर के इस मंदिर में जाते थे और दोपहर में वहाँ प्रसाद ग्रहण करते थे। इस मंदिर के देवता, श्री श्री राधा-गोविंद और गौरांग विग्रह अत्यंत सुंदर हैं। वल्लभापुर के पास जगन्नाथ का एक सुंदर मंदिर है। हम कभी-कभी इस जगन्नाथ मंदिर में भी प्रसाद ग्रहण करते थे। ये दोनों मंदिर कलकत्ता के पास श्रीरामपुर रेलवे स्टेशन से एक मील के दायरे में स्थित हैं।
