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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 8: लेखक का कृष्ण तथा गुरु से आदेश प्राप्त करना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  1.8.62 
वैष्णवेर गुण - ग्राही, ना देखये दोष ।
काय - मनो - वाक्ये करे वैष्णव - सन्तोष ॥62॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने सदैव वैष्णवों के अच्छे गुणों को स्वीकार किया और उनमें कभी दोष नहीं ढूँढ़े। उन्होंने अपना तन-मन केवल वैष्णवों को संतुष्ट करने में ही लगाया।
 
He always acknowledged the virtues of Vaishnavas and found no faults in them. He devoted his whole heart and soul to appeasing them.
तात्पर्य
यह एक वैष्णव की योग्यता है कि वह अदोष-दर्शी है: वह दूसरों की गलतियाँ कभी नहीं देखता। बेशक, हर इंसान में अच्छे गुण और दोष दोनों होते हैं। इसलिए यह कहा गया है, सज्जन गुणम इच्छन्ति दोषं इच्छन्ति पामराः: हर किसी में दोषों और महिमा का मिश्रण होता है। लेकिन एक वैष्णव, एक संयमी व्यक्ति, केवल मनुष्य की महिमा को स्वीकार करता है, उसकी गलतियों को नहीं, क्योंकि मक्खियाँ घावों को ढूंढती हैं जबकि मधुमक्खियाँ शहद को ढूंढती हैं। हरिदास पंडित ने कभी भी किसी वैष्णव में दोष नहीं ढूंढा बल्कि केवल उसके अच्छे गुणों पर विचार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)